धनतेरस की रात एक बच्चे के पीछे पड़ी वो डायन… उसके बाद बच्चे के साथ जो हुआ किसी ने सोचा भी नहीं था। पढ़िए ये Chudail Ki Kahani।
धनतेरस की रात – Chudail Ki Kahani
धनतेरस का दिन था। गुड़गांव के एक बड़े मॉल में दिवाली की शॉपिंग करने के बाद राहुल, प्रिया और उनका छह साल का बेटा रवि घर लौटने के लिए सड़क पर चल रहे थे। रात हो चुकी थी, थोड़ी देर पहले तेज बारिश हुई थी और अभी भी आसमान में कभी-कभी बिजली चमक रही थी।
दिवाली से एक दिन पहले होने की वजह से सारे रिक्शा वाले जल्दी घर चले गए थे। सड़क सुनसान पड़ी थी, बस कहीं-कहीं गाड़ियों की आवाज सुनाई देती। राहुल और प्रिया कोई गाड़ी मिलने का इंतजार करते हुए पैदल ही आगे बढ़ रहे थे।
चलते-चलते उनके बच्चे रवि की नजर सड़क किनारे पड़े एक नींबू-मिर्ची पर गई। बिना सोचे-समझे उसने उसे लात मार दी।
“नहीं बेटा, ऐसे नहीं करते,” प्रिया ने हल्के से टोका और फिर तीनों आगे बढ़ गए, बिना इस बात पर ज्यादा ध्यान दिए।
एक पुरानी मेज और वो अजीब आंटी

थोड़ी देर चलने के बाद रवि को प्यास लगी। “मम्मा, पानी,” उसने कहा।
राहुल ने कहा, “तुम दोनों यहीं बैठो, मैं पानी लेकर आता हूं,” और पास की एक दुकान की तरफ बोतल लेने चला गया।
प्रिया रवि को एक पुरानी सी लकड़ी की मेज पर बिठाकर खुद उसके सामने बैठ गई। अपने दुपट्टे से उसका मुंह पोंछने लगी। तभी रवि की नजर उसके मम्मा के पीछे कहीं अटक गई।
“मम्मा वो आंटी,” रवि ने उंगली से इशारा किया।
प्रिया ने पीछे मुड़कर देखा, कुछ नहीं दिखा। “कौन आंटी बेटा?” उसने रवि की तरफ देखते हुए पूछा।
रवि ने फिर से पीछे देखा। इस बार उसका चेहरा एकदम सफेद पड़ गया।
वहां, कुछ ही कदम दूर, एक औरत खड़ी थी। पूरी तरह सफेद कपड़ों में। उसके बाल इतने लंबे और बिखरे हुए थे कि चेहरा पूरी तरह ढका हुआ था। और उसका सिर हल्का सा टेढ़ा था, जैसे वो सीधे रवि को ही घूर रही हो।
रवि इतना डर गया कि उसके मुंह से कुछ निकल ही नहीं पाया। उसके दांत ऐसे बजने लगे जैसे कड़ाके की ठंड पड़ रही हो। वो चुपचाप अपनी मम्मी के पल्लू में मुंह छुपाकर बैठ गया, फिर पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत ही नहीं हुई उसकी।
अचानक डर बढ़ता ही गया
राहुल पानी लेकर लौटा। “क्या हुआ? क्या हुआ बेटा, लो पानी पी लो।”
“पता नहीं राहुल क्या हो गया इसे,” प्रिया परेशान होकर बोली। “अभी तक बोल रहा था मुझे कि मम्मी वो देखो आंटी।”
“आंटी? कौन आंटी?” राहुल ने कहा
“मैंने भी देखा, वहां तो कोई नहीं है,” प्रिया ने हैरानी से कहा।
राहुल ने बात को हल्के में लिया। “अरे कुछ नहीं, लो बेटा पानी पी लो।”
बड़ी मुश्किल से मनाकर रवि को पानी पिलाया गया। फिर तीनों आगे बढ़े, प्रिया ने रवि को गोद में उठा लिया। कुछ ही कदम चले होंगे कि रवि ने फिर पीछे देखा और इस बार उसकी आवाज कांप रही थी।
“मम्मी वो आंटी… पीछे-पीछे आ रही है।”
राहुल और प्रिया दोनों ने तुरंत पीछे मुड़कर देखा। सड़क बिल्कुल खाली थी। कोई नहीं था वहां। पर रवि की आंखों में जो खौफ था, वो झूठा नहीं लग रहा था।
कुछ देर बाद उन्हें एक टैक्सी मिल गई, जिसे एक लड़की चला रही थी। “बोलिए कहां जाना है?” उसने पूछा। राहुल ने पता बताया और तीनों बैठ गए।
आधी रात का वो पल
घर पहुंचते-पहुंचते काफी रात हो चुकी थी। तीनों बहुत थके हुए थे, सभी को बिस्तर पर लेटते ही नींद आ गई।
रात करीब दो बजे रवि की आंख खुली। उसे प्यास लगी थी। वो मम्मी को जगाने ही वाला था कि उसकी नजर कमरे के कोने पर पड़ी।
वहीं खड़ी थी वो औरत। वही सफेद कपड़े, वही बिखरे बाल जो चेहरा छुपाए हुए थे।
रवि की चीख निकल गई। इतनी जोर से कि प्रिया और राहुल दोनों हड़बड़ाकर उठ बैठे। कमरे की लाइट जलाई गई, कोने में कुछ नहीं था। पर रवि रोए जा रहा था, कांप रहा था, कुछ बोल ही नहीं पा रहा था।
उसी रात रवि को तेज बुखार चढ़ आया। पूरा शरीर तप रहा था। किसी तरह उसे शांत करके सुला दिया गया, पर प्रिया और राहुल की आंखों में नींद नहीं थी।
दिवाली की सुबह जो मनहूस हो गई
अगली सुबह दिवाली का दिन था। बाजारों में रौनक थी, हर तरफ रोशनी और चहल-पहल। राहुल घर के बाहर अपने दोस्तों से बात कर रहा था, प्रिया रसोई में खाना बना रही थी।
तभी राहुल खाना खाने के लिए टेबल पर बैठा, प्रिया खाना लगाने वाली ही थी कि अंदर के कमरे से रवि की जोरदार चीख सुनाई दी।
प्रिया के हाथ से थाली छूटकर नीचे गिर गई, टूट गई। दोनों दौड़ते हुए कमरे में पहुंचे।
रवि को तेज बुखार था, शरीर भट्टी की तरह जल रहा था। वो कुछ बोल नहीं पा रहा था, बस बेसुध सा पड़ा था।
राहुल और प्रिया उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले गए। इंजेक्शन लगाया गया, दवाई दी गई, पर बुखार जरा भी कम नहीं हुआ। डॉक्टर ने भी हैरानी जताई कि रिपोर्ट में सब नॉर्मल है, फिर भी बच्चे की हालत बिगड़ती जा रही है।
दादी का फोन और वो सच जो अब सामने आया
उसी शाम राहुल की मां का फोन आया। हाल-चाल पूछने के लिए। राहुल ने घबराई आवाज में सारी बात बता दी – नींबू-मिर्ची, वो सफेद कपड़ों वाली औरत, रात का डर, अब ये बुखार।
फोन पर कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर दादी की आवाज आई, बहुत गंभीर।
“तुम लोग अभी के अभी बच्चे को लेकर गांव आ जाओ। फोन पर बात करने की चीज नहीं है ये।”
राहुल का परिवार मूल रूप से राजस्थान के एक छोटे से गांव, बरखेड़ा से था। रात को ही राहुल, प्रिया और बुखार से तपते रवि को लेकर गांव पहुंचे। दादी-दादा दरवाजे पर ही इंतजार कर रहे थे, चेहरे पर चिंता साफ झलक रही थी।
तांत्रिक बाबा का दरवाजा
रात को ही परिवार वाले रवि को गांव के एक जाने-माने तांत्रिक बाबा के पास ले गए, जो गांव के बाहर एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे अपनी कुटिया में रहते थे।
बाबा ने रवि को देखते ही आंखें बंद कर लीं, कुछ देर मंत्र बुदबुदाते रहे। फिर आंखें खोलकर बोले, “इस बच्चे के पीछे एक बहुत पुरानी और बहुत ताकतवर डायन पड़ी है। ये उसे अपने साथ ले जाना चाहती है।
“प्रिया की आंखों में आंसू आ गए। “बाबा जी, कुछ भी कीजिए, मेरे बेटे को बचा लीजिए।”
बाबा ने समझाया, “धनतेरस के दिन सड़क पर पड़ी नींबू-मिर्ची किसी की टोन-टोटके की चीज थी। किसी ने अपनी बला उतार कर वहीं छोड़ी थी। तुम्हारे बेटे ने अनजाने में उसे लात मार दी, और वो चीज उसके साथ चिपक गई।”
“अब क्या होगा बाबा जी?” राहुल ने घबराते हुए पूछा।
“चिंता मत करो,” बाबा ने भरोसा दिलाया। “तुम सही समय पर आ गए हो। अगर एक-दो दिन और देर हो जाती तो कुछ भी अनर्थ हो सकता था।”
झाड़े की वो रात

बाबा ने रवि को अपने सामने बिठाया, चारों तरफ दीये जलाए गए। हाथ में नीम की टहनी लेकर बाबा मंत्र पढ़ते हुए रवि के ऊपर से झाड़ा देने लगे। कमरे में अजीब सी हवा चलने लगी, दीये की लौ बार-बार हिलने लगी, हालांकि खिड़की-दरवाजे सब बंद थे।
रवि अचानक जोर-जोर से रोने लगा, फिर धीरे-धीरे शांत हो गया। बाबा ने कुछ देर बाद आंखें खोलीं, माथे पर पसीना था।
“हो गया,” बाबा ने कहा। “अब ये उसका पीछा नहीं करेगी। पर याद रखना, इसके बाद कुछ दिन तक बच्चे को अकेला मत छोड़ना, और घर की देहरी पर हर शाम एक दीया जरूर जलाना।”
उस रात के बाद रवि का बुखार धीरे-धीरे उतरने लगा। दो दिन में वो पहले जैसा हंसता-खेलता बच्चा बन गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
—-समाप्त—
इस कहानी से सीख
राहुल और प्रिया ने बाद में एक बात हमेशा याद रखी, और आज भी हर किसी को यही समझाते हैं – त्योहारों के समय, खासकर धनतेरस, दिवाली, होली या अमावस्या की रातों में, रास्ते में पड़ी किसी भी अनजान चीज को कभी नहीं छूना चाहिए, न ही उसे लात मारनी चाहिए। नींबू-मिर्ची, काला धागा, सिंदूर लगी कोई चीज, टूटी चूड़ियां – ये सब अक्सर किसी के टोने-टोटके का हिस्सा होते हैं, और अनजाने में भी इनसे छेड़छाड़ भारी पड़ सकती है।
खासकर छोटे बच्चों को साथ लेकर चलते वक्त इस बात का और भी ज्यादा ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि कहते हैं कि मासूम बच्चों पर ऐसी चीजों का असर सबसे जल्दी होता है।
अगर आपके साथ या आपके किसी जानने वाले के साथ भी कभी ऐसा कोई अजीब अनुभव हुआ हो, तो नीचे कमेंट में जरूर बताएं। और ऐसी ही डरावनी कहानियों के लिए हमारी वेबसाइट पर बने रहें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल-जवाब (FAQs)
1. डायन और चुड़ैल में क्या फर्क होता है?
लोक मान्यताओं के अनुसार डायन एक जीवित इंसान होती है जिसके पास तांत्रिक शक्तियां मानी जाती हैं, जबकि चुड़ैल किसी मृत आत्मा को कहा जाता है जो अतृप्त इच्छाओं या बुरी मौत के कारण भटकती रहती है। दोनों शब्द अक्सर एक-दूसरे की जगह इस्तेमाल कर लिए जाते हैं, लेकिन मूल मान्यता अलग है।
2. धनतेरस और दिवाली की रात को लेकर ऐसी कहानियां क्यों ज्यादा सुनने को मिलती हैं?
मान्यता है कि दिवाली और अमावस्या के आसपास की रातें तांत्रिक दृष्टि से बहुत शक्तिशाली मानी जाती हैं। इन दिनों लोग टोने-टोटके, बला उतारने जैसी चीजें करते हैं, इसलिए रास्तों में पड़ी नींबू-मिर्ची, काला धागा जैसी चीजों से जुड़ी घटनाएं इन्हीं दिनों ज्यादा सामने आती हैं।
3. रास्ते में पड़ी नींबू-मिर्ची या काला धागा छूने से क्या होता है?
लोक विश्वास के अनुसार ये चीजें अक्सर किसी की बला उतारने या टोना-टोटका करने के लिए इस्तेमाल होती हैं और जानबूझकर सड़क पर छोड़ी जाती हैं। कहा जाता है कि इन्हें छूने या ठोकर मारने से वो नकारात्मक ऊर्जा उस इंसान के साथ चिपक सकती है, इसलिए बड़े-बुजुर्ग हमेशा इनसे दूर रहने की सलाह देते हैं।
4. बच्चों पर ऐसी नकारात्मक शक्तियों का असर जल्दी क्यों होता है, ऐसा क्यों कहा जाता है?
मान्यता है कि छोटे बच्चों की आभा या ऊर्जा कमजोर होती है और वो चीजों को बहुत मासूमियत से महसूस करते हैं, इसलिए लोक कथाओं में अक्सर कहा जाता है कि बच्चे ऐसी चीजों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं और उन्हें चीजें जल्दी दिख या महसूस हो जाती हैं जो बड़ों को नहीं होतीं।
5. अगर कभी ऐसा कोई अनुभव हो जाए तो क्या करना चाहिए?
बड़े-बुजुर्गों का मानना है कि ऐसी स्थिति में घबराने की बजाय घर में दीया जलाना चाहिए, बच्चे को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए, और अगर बार-बार कोई अजीब अनुभव हो तो किसी अनुभवी व्यक्ति या धार्मिक स्थल की सलाह ले लेनी चाहिए। सबसे जरूरी है शांत रहना और घर का माहौल सकारात्मक बनाए रखना।
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