PG नंबर 312 जिस कमरे से तीन लड़के भाग गए: PG Room Horror Story In Hindi

PG Room Horror Story In Hindi — PG नंबर 312 में रात के 12 बजे दरवाजे पर दस्तक होती थी। तीन लड़के डरकर भाग चुके थे, लेकिन अंकित ने दरवाजा खोलने की हिम्मत की। उसके बाद जो हुआ, वो आपके रोंगटे खड़े कर देगा। पढ़ें पूरी कहानी।


PG नंबर 312: PG Room Horror Story In Hindi

अंकित पांडे बिहार के एक छोटे कस्बे से पुणे आया था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके पहली नौकरी लगी थी, और अब उसे पुणे में रहने के लिए ठिकाना चाहिए था। कंपनी का ऑफिस हिंजेवाड़ी में था, और वहां आसपास के पीजी और फ्लैट्स के किराए सुनकर अंकित के होश उड़ गए। दस से पंद्रह हजार महीना, वो भी सिर्फ एक कमरे के लिए, वो भी शेयरिंग में।

अंकित की सैलरी अभी शुरुआती दौर की थी, बाईस हजार रुपये महीना। इसमें से खाना, आना-जाना, और बाकी खर्चे निकालने के बाद किराए के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं बचती थी। इसलिए वो तीन दिन से पुणे की गलियों में पीजी ढूंढ रहा था, कभी दलाल से मिलता, कभी सीधे मकान मालिक से बात करता, लेकिन कहीं बात नहीं बन रही थी।

चौथे दिन एक पुराने साथी ने उसे एक नंबर दिया। बोला, हिंजेवाड़ी के पास ही एक पीजी है, सिंह भाई की, वहां एक कमरा बहुत सस्ते में मिल रहा है, बाकी सब भरे पड़े हैं लेकिन ये वाला कमरा खाली है काफी दिनों से।

अंकित ने फोन मिलाया। सिंह भाई ने बताया कि कमरा तीन हजार रुपये महीने में मिल जाएगा, वो भी अटैच बाथरूम के साथ। बाकी सारे कमरों का किराया सात से आठ हजार था। इतना फर्क सुनकर अंकित को अजीब तो लगा, लेकिन उसने सोचा शायद कमरा छोटा होगा या फिर हवादार नहीं होगा। पैसों की तंगी में इतना सोचने का वक्त भी नहीं था।

सस्ते कमरे के पीछे का सच

शाम को वो पीजी देखने पहुंचा। बिल्डिंग पुरानी थी लेकिन साफ-सुथरी। सिंह भाई खुद बाहर आकर मिले, पचास के आसपास की उम्र, चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी। कमरा दिखाते वक्त वो बार-बार कुछ कहना चाहते थे, फिर रुक जाते।

कमरा तीसरी मंजिल पर था, नंबर 312। कमरे में घुसते ही अंकित को कुछ अटपटा लगा। कमरा बड़ा था, बाकी कमरों से भी बड़ा, खिड़की से अच्छी हवा आ रही थी, फर्नीचर भी नया लग रहा था। इतना अच्छा कमरा इतने कम किराए में, अंकित को समझ नहीं आया माजरा क्या है।

उसने पूछ ही लिया, भाई साहब, इतना अच्छा कमरा है, फिर किराया इतना कम क्यों?

सिंह भाई कुछ पल चुप रहे, फिर बोले, बेटा, तुम्हें सच बता दूं, ये कमरा पिछले दो साल से खाली पड़ा था। तीन लड़के इसमें रुके थे, बारी-बारी से, और तीनों एक ही महीने के अंदर सामान छोड़कर रात के अंधेरे में भाग गए। किसी ने वापस मुड़कर नहीं देखा, किराया भी नहीं मांगा, बस भाग गए।

अंकित हंस पड़ा, बोला, ये सब अंधविश्वास की बातें हैं भाई साहब, मुझे कोई दिक्कत नहीं है। मैं रुक जाऊंगा।

सिंह भाई ने गहरी सांस ली, बोले, ठीक है बेटा, लेकिन एक बात का ध्यान रखना, रात को बारह बजे के बाद दरवाजा मत खोलना, चाहे बाहर से कोई भी आवाज दे।

अंकित ने बात को मजाक में लिया और सामान लेकर उसी शाम शिफ्ट हो गया।

रात के बारह बजे की दस्तक

PG Room Horror Story In Hindi — रात के बारह बजे कमरे के दरवाजे पर दस्तक और डरा हुआ अंकित

पहले दो दिन बिल्कुल सामान्य रहे। अंकित ऑफिस जाता, थका-हारा लौटता, खाना खाकर सो जाता। सब कुछ सही चल रहा था। तीसरे दिन रात को कुछ अलग हुआ।

रात के करीब एक बज रहे थे। अंकित की नींद अचानक खुल गई, ऐसा लगा जैसे किसी ने उसका नाम पुकारा हो। उसने आंखें खोलीं, कमरे में पूरा अंधेरा था, सिर्फ खिड़की से बाहर की स्ट्रीट लाइट की हल्की रोशनी अंदर आ रही थी। तभी उसे लगा जैसे कमरे के दरवाजे के पीछे कोई खड़ा है।

अंकित ने घबराकर मोबाइल की टॉर्च जलाई। दरवाजे पर कोई नहीं था। उसने सोचा शायद नींद में देखा कोई भ्रम था। लेकिन तभी दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई, बहुत धीमी, जैसे कोई बहुत आहिस्ता से खटखटा रहा हो।

अंकित का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसे सिंह भाई की बात याद आई, रात बारह बजे के बाद दरवाजा मत खोलना। घड़ी में एक बज चुका था। दस्तक फिर हुई, इस बार थोड़ी तेज। साथ में एक आवाज आई, बहुत धीमी, जैसे कोई फुसफुसा रहा हो, अंकित भैया, दरवाजा खोलो, मुझे बहुत ठंड लग रही है।

अंकित को समझ नहीं आया कि उसका नाम इस पीजी में किसी को पता कैसे चला, वो तो अभी तीन दिन पहले ही आया था। उसने बिस्तर से उतरने की हिम्मत नहीं की, चादर सिर तक ओढ़ ली, और मन में भगवान का नाम जपता रहा।

दस्तक करीब आधे घंटे तक चलती रही, फिर अचानक बंद हो गई। अंकित को पूरी रात नींद नहीं आई, सुबह जल्दी उठकर वो नीचे सिंह भाई के पास पहुंचा।

सिंह भाई ने उसकी हालत देखकर ही सब समझ लिया। बोले, कल रात कुछ हुआ था ना?

अंकित ने पूरी बात बताई। सिंह भाई की आंखों में डर साफ दिख रहा था। उन्होंने बताया कि पहले वाले तीनों लड़कों के साथ भी यही हुआ था, दरवाजे पर दस्तक, कोई नाम लेकर बुलाता, और वो लड़के इतने डर गए थे कि सुबह होते ही सामान उठाकर भाग गए थे।

विशाल की कहानी

PG नंबर 312 की डरावनी कहानी में विशाल का तनाव और अकेलेपन से भरा कमरा

अंकित ने पूछा, आखिर माजरा क्या है इस कमरे का, कोई तो वजह होगी।

सिंह भाई ने बताया कि आठ साल पहले इस कमरे में एक लड़का रहता था, नाम था विशाल, वो भी नौकरी की तलाश में शहर आया था। पैसों की तंगी के चलते वो लगातार तनाव में रहता था, घरवालों से झूठ बोलकर पैसे मंगवाता, नौकरी लगने का झूठ बोलता। एक रात उसने इसी कमरे में फांसी लगा ली। पुलिस केस हुआ, मामला रफा-दफा हो गया, लेकिन उसके बाद से जो भी इस कमरे में अकेला रहता है, उसे रात को वही दस्तक सुनाई देती है, विशाल की आत्मा आज भी अपने कमरे में किसी साथी की तलाश में है।

अंकित का शरीर सुन्न पड़ गया। उसने पूछा, तो फिर मुझे ये कमरा दिया ही क्यों भाई साहब?

सिंह भाई ने शर्मिंदगी से नजरें झुका लीं, बोले, बेटा, ये पूरी बिल्डिंग मेरी जमा-पूंजी है, बैंक का लोन चढ़ा है इस पर, अगर एक कमरा खाली पड़ा रहे तो घाटा होता है। इसीलिए कम किराए पर देता हूं, उम्मीद रहती है कि शायद कोई टिक जाए।

अंकित को गुस्सा आना चाहिए था, लेकिन उसे सिंह भाई की हालत देखकर तरस भी आया। उसने फैसला किया कि वो एक रात और रुकेगा, इस बार डरेगा नहीं, बल्कि पता लगाएगा कि आखिर माजरा क्या है।

दरवाजे के पार की सच्चाई

उस रात अंकित ने कमरे में एक मोमबत्ती जलाई, अगरबत्ती लगाई, और जागते रहने का फैसला किया। रात करीब सवा बारह बजे वही दस्तक शुरू हुई, इस बार आवाज पहले से ज्यादा साफ थी। अंकित भैया, दरवाजा खोल दो, बहुत ठंड लग रही है, मुझे अंदर आना है।

अंकित ने हिम्मत जुटाकर पूछा, तुम कौन हो, यहां क्या चाहिए तुम्हें?

आवाज कुछ पल के लिए रुक गई, फिर बोली, मैं विशाल हूं भैया, आठ सालों से अकेला हूं यहां, कोई मेरे साथ रहने वाला नहीं मिलता, सब डरकर भाग जाते हैं। तुम मत भागना भैया, मुझे बस एक दोस्त चाहिए, जो मेरी बात मेरे माता-पिता तक पहुँचा दे।

अंकित की आंखों में आंसू आ गए, डर के साथ-साथ अजीब सी हमदर्दी भी महसूस हुई। उसने पूछा, तुम इतने परेशान क्यों थे विशाल, तुमने ऐसा कदम क्यों उठाया?

आवाज कांपने लगी, बोली, घरवालों को बताया था कि नौकरी लग गई, बड़े-बड़े सपने दिखाए थे, लेकिन हकीकत में महीनों से बेरोजगार था, पैसे उधार लेकर गुजारा कर रहा था। शर्म के मारे घर वापस नहीं जा सका, और यहीं हिम्मत तोड़ दी।

अंकित ने दरवाजे के पास बैठकर धीमी आवाज में कहा, विशाल, तुम जो कर चुके हो वो हो चुका, लेकिन अब यहां भटकते रहने से क्या मिलेगा तुम्हें? तुम्हारे घरवाले आज भी तुम्हारा इंतजार करते होंगे, उन्हें सच पता होना चाहिए ताकि वो शांति से जी सकें और तुम भी मुक्त हो सको।

कुछ देर सन्नाटा रहा, फिर दरवाजे के दूसरी तरफ से धीमी सिसकने की आवाज आई। विशाल ने बताया कि उसके घरवाले आज भी उसी कस्बे में रहते हैं जहां से वो आया था, नाम पता सब बताया, कहा कि उसकी डायरी आज भी कमरे की छत के ऊपर, फॉल्स सीलिंग के अंदर छुपी है, उसमें सब लिखा है।

डायरी और आखिरी मुक्ति

PG नंबर 312 में मिली विशाल की पुरानी डायरी और उसके आखिरी राज का रहस्यमयी दृश्य

सुबह होते ही अंकित ने सिंह भाई की मदद से फॉल्स सीलिंग खुलवाई। वाकई वहां एक पुरानी डायरी मिली, पूरी तरह सीलबंद प्लास्टिक में लिपटी हुई, जिसमें विशाल ने अपने आखिरी दिनों की हालत, अपने घर का पता, और अपने मां-बाप के लिए एक माफीनामा लिखा था।

अंकित ने खुद उस कस्बे का पता लगाया, विशाल के घरवालों से संपर्क किया, उन्हें डायरी भिजवाई और पूरी सच्चाई बताई। विशाल के बूढ़े मां-बाप ने आठ साल बाद अपने बेटे का फिर से अंतिम संस्कार करवाया, इस बार पूरे रीति-रिवाज से, मन की शांति के साथ, क्योंकि इस बार उसके माँ बाप को असली बात पता चली थी।

उस रात के बाद कमरा नंबर तीन सौ बारह में फिर कभी कोई दस्तक नहीं हुई। अंकित आज भी उसी कमरे में रहता है, बिना किसी डर के।

—समाप्त—

सीख: पीजी लेने से पहले क्या सावधानी बरतें

यह कहानी सिर्फ एक भूत की नहीं है, यह उन हजारों छात्रों और नौकरीपेशा लड़के-लड़कियों की भी है जो हर साल अनजान शहरों में अकेले पीजी और हॉस्टल में रहने पहुंचते हैं। सस्ते किराए के लालच में अक्सर लोग बिना जांचे-परखे कमरा ले लेते हैं, जबकि किसी भी नए पीजी या हॉस्टल में शिफ्ट होने से पहले मकान मालिक का पूरा नाम-पता, पुलिस वेरिफिकेशन, और एग्रीमेंट जरूर चेक करना चाहिए। कमरे का किराया आसपास के बाकी कमरों से बहुत ज्यादा या कम हो तो यह जानने की कोशिश जरूर करनी चाहिए कि वजह क्या है। इसके अलावा पीजी में रहने वाले छात्रों और नौकरीपेशा लोगों को एक बेसिक हेल्थ और एक्सीडेंट इंश्योरेंस भी जरूर लेना चाहिए, ताकि अनजान शहर में अकेले रहते हुए किसी भी इमरजेंसी में आर्थिक बोझ न उठाना पड़े।

परिवार से दूर रहने वाले हर छात्र और युवा को अपने माता-पिता से नियमित बातचीत बनाए रखनी चाहिए, ताकि तनाव की स्थिति में अकेलापन हावी न हो सके।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल-जवाब (FAQs)

1. किराया आसपास के बाकी कमरों से बहुत कम हो तो क्या करना चाहिए?

इतनी सस्ती डील देखकर सीधे हां मत बोलिए। मकान मालिक से खुलकर वजह पूछिए, कमरे की हालत, बिल्डिंग की उम्र और पड़ोस का माहौल खुद जाकर देखिए। सिर्फ ऑनलाइन फोटो या फोन पर बात करके फैसला मत लीजिए।

2. अकेले नए शहर में रहते वक्त कौन सा इंश्योरेंस लेना चाहिए?

हर छात्र और नौकरीपेशा युवा को कम से कम एक बेसिक हेल्थ इंश्योरेंस और एक्सीडेंट कवर जरूर लेना चाहिए।

3. पीजी में अकेलापन या तनाव महसूस हो तो क्या करें?

घरवालों और दोस्तों से नियमित बातचीत बनाए रखें, अकेले सब कुछ झेलने की कोशिश न करें। अगर पैसों की या नौकरी की टेंशन ज्यादा बढ़ रही हो तो किसी करीबी से बात जरूर करें, ये कोई कमजोरी नहीं बल्कि सही समय पर उठाया गया सही कदम होता है।


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