पेट्रोल पंप की नाइट ड्यूटी | Horror Story in Hindi for Reading

पेट्रोल पंप की नाइट ड्यूटी में रोहित को सुनाई देती थीं रहस्यमयी चीखें। पढ़िए एक डरावनी और रहस्यमयी Horror Story in Hindi.


पेट्रोल पंप की नाइट ड्यूटी | Horror Story in Hindi for Reading

कहानी की शुरुआत

रोहित को नौकरी की सख्त जरूरत थी। शिमला के एक छोटे से कस्बे में उसका घर था, पिता खेतों में मजदूरी करते थे, और घर में तीन भाई-बहन थे जिनकी पढ़ाई का खर्चा उठाना मुश्किल हो रहा था। बारहवीं के बाद रोहित ने बहुत जगह नौकरी ढूंढी, लेकिन पहाड़ी इलाकों में काम मिलना आसान नहीं होता।

आखिरकार एक दिन कस्बे के बाजार में उसे एक इश्तिहार दिखा। नारकंडा की तरफ जाने वाली सड़क पर एक पुराना पेट्रोल पंप था, वहां रात की ड्यूटी के लिए एक अटेंडेंट चाहिए था। तनख्वाह बाकी जगहों से थोड़ी ज्यादा थी, शायद इसीलिए क्योंकि रात की ड्यूटी थी और जगह बहुत सुनसान थी।

रोहित ने बिना ज्यादा सोचे नौकरी के लिए फॉर्म भर दिया। पैसों की तंगी में इतना सोचने का वक्त नहीं था कि जगह कैसी है, माहौल कैसा है।

पंप का मालिक, ठाकुर साहब, पहली मुलाकात में ही रोहित को समझाने लगे। बोले, बेटा, ये जगह थोड़ी अलग है। दिन में तो ठीक-ठाक गाड़ियां आती हैं, टूरिस्ट लोग, ट्रक वाले, लेकिन रात होते ही सन्नाटा छा जाता है। कभी-कभी तो पूरी रात एक भी गाड़ी नहीं आती, कभी एक-दो आ जाती हैं। तुम्हारा काम बस इतना है कि रात भर पंप पर बैठे रहना है, कोई गाड़ी आए तो पेट्रोल भर देना, बाकी समय आराम करना।

रोहित को ये काम आसान लगा। उसने पूछा, ठाकुर साहब, रहने की जगह कैसी है?

ठाकुर साहब ने पंप के पीछे बने एक छोटे से कमरे की तरफ इशारा किया। बोले, वो रहा तुम्हारा कमरा, बस इतनी सी बात का ध्यान रखना, कमरे की पिछली दीवार से आगे मत जाना, वहां सीधी खाई है, बहुत गहरी। रात के अंधेरे में अगर गलती से भी उस तरफ चले गए तो पता भी नहीं चलेगा और सीधे नीचे।

रोहित ने सिर हिलाया और उसी हफ्ते ड्यूटी शुरू कर दी।

Horror Story in Hindi – रात के सुनसान पेट्रोल पंप पर नाइट ड्यूटी करता रोहित

पहली रात कुछ खास नहीं हुआ। सुनसान सड़क, ठंडी पहाड़ी हवा, दूर-दूर तक फैले देवदार के पेड़, और बीच-बीच में कभी कोई ट्रक गुजरता तो हल्की सी हलचल हो जाती। रोहित ने कमरे में एक छोटा सा हीटर जलाया, चाय बनाई, और बाकी रात मोबाइल में गाने सुनते हुए काट दी।

दूसरी और तीसरी रात भी कुछ वैसी ही रही। रोहित को धीरे-धीरे इस अकेलेपन की आदत होने लगी थी। उसने पंप के पास ही एक छोटा सा रजिस्टर बनाना शुरू किया, जिसमें वो लिखता था कि किस दिन कितनी गाड़ियां आईं। हफ्ते में मुश्किल से दस-बारह गाड़ियां आती थीं, बाकी वक्त बिल्कुल खाली।

कमरे की पिछली दीवार से आती आवाज

चौथी रात को कुछ अलग हुआ। रात के करीब दो बज रहे थे, रोहित कमरे में लेटा हुआ था, हल्की नींद आ रही थी, तभी उसे कमरे की पिछली दीवार से एक धीमी सी आवाज सुनाई दी। बहुत हल्की, जैसे कोई दूर से बुला रहा हो, या कोई रो रहा हो।

रोहित उठकर बैठ गया, कान लगाकर सुनने की कोशिश की। आवाज बहुत धीमी थी, समझ नहीं आ रहा था कि क्या है। उसने सोचा शायद हवा की आवाज होगी, पहाड़ी इलाकों में रात को हवा अजीब-अजीब आवाजें करती है। वो फिर से लेट गया।

लेकिन कुछ देर बाद आवाज फिर आई, इस बार थोड़ी साफ। ऐसा लगा जैसे कई लोगों की चीखने-चिल्लाने की आवाज हो, बहुत दूर से, जैसे किसी गहरी खाई के तल से आ रही हो। रोहित का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसने हिम्मत करके कमरे से बाहर निकलकर पीछे की तरफ देखा।

बाहर घना अंधेरा था, दूर तक कुछ नहीं दिख रहा था, बस पहाड़ों की परछाइयां और नीचे गहरी खाई का अंदाजा भर हो रहा था। आवाज अब बंद हो चुकी थी। रोहित ने सोचा शायद कोई जानवर होगा, या फिर हवा का शोर, और वापस अंदर जाकर सो गया।

सुबह उसने ये बात ठाकुर साहब को बताई जब वो चेकिंग के लिए आए। ठाकुर साहब का चेहरा एक पल के लिए सख्त हो गया, फिर उन्होंने बात को टालते हुए कहा, अरे बेटा, पहाड़ों में ऐसी आवाजें आती रहती हैं, हवा का काम है, ज्यादा दिमाग मत लगाओ।

लेकिन रोहित ने देखा कि ठाकुर साहब की आंखों में कुछ छिपा हुआ था, कुछ ऐसा जो वो बताना नहीं चाहते थे।

बीस साल पुराना हादसा

अगले कुछ दिनों तक सब सामान्य रहा, लेकिन रोहित का ध्यान अब बार-बार उस खाई की तरफ जाने लगा था। एक दिन दोपहर को, जब वो पंप पर अकेला बैठा था, एक बुजुर्ग आदमी अपनी पुरानी मोटरसाइकिल में पेट्रोल भरवाने आया। बातों-बातों में रोहित ने उससे पूछ लिया, बाबा, ये पीछे जो खाई है, उसके बारे में कुछ जानते हैं आप?

बुजुर्ग आदमी का चेहरा गंभीर हो गया। बोला, बेटा, तुम नए हो शायद, इसीलिए नहीं जानते। बीस साल पहले, इसी मोड़ पर, एक बस खाई में गिर गई थी। बरसात का मौसम था, सड़क फिसलन भरी थी, ड्राइवर ने ब्रेक लगाई लेकिन बस संभल नहीं पाई। पैंतालीस लोग थे बस में, स्कूल के बच्चे भी थे, टीचर भी थे, कुछ लोकल यात्री भी थे। कोई नहीं बचा, कोई भी नहीं।

रोहित के रोंगटे खड़े हो गए। उसने पूछा, तो फिर बॉडी वगैरह निकाली गई थीं?

बुजुर्ग ने सिर हिलाया, बोला, खाई इतनी गहरी और खतरनाक है कि उस वक्त की रेस्क्यू टीम बहुत सी बॉडी निकाल नहीं पाई थी। कहते हैं कुछ लोग आज भी वहीं नीचे हैं, बरसों से, कभी उनका सही से अंतिम संस्कार नहीं हो पाया। गांव वाले कहते हैं कि उनकी आत्माएं आज भी ऊपर आने की कोशिश करती हैं, लेकिन खाई इतनी गहरी है कि वो कभी बाहर नहीं निकल पातीं।

बुजुर्ग आदमी पेट्रोल भरवाकर चला गया, लेकिन उसकी बातें रोहित के दिमाग में घूमती रहीं। अब उसे समझ आया कि क्यों ठाकुर साहब बार-बार पिछली दीवार से दूर रहने की बात करते थे।

उस रात रोहित को नींद नहीं आई। वो जानबूझकर जागता रहा, ये सोचकर कि अगर आवाज फिर आए तो ध्यान से सुनेगा। ठीक रात के दो बजे, वही आवाज फिर शुरू हुई, इस बार पहले से ज्यादा साफ। चीखों के बीच कुछ शब्द भी सुनाई देने लगे, बचाओ… कोई हमें ऊपर खींचो… हम बहुत नीचे फंस गए हैं…

रोहित का पूरा शरीर पसीने से भीग गया, हालांकि रात बहुत ठंडी थी। उसने चादर मुंह तक खींच ली और भगवान का नाम जपता रहा, जब तक आवाज बंद नहीं हो गई।

हर हफ्ते पास आती आवाज

अगले कुछ हफ्तों में रोहित ने महसूस किया कि वो आवाजें अब हर रात नहीं, बल्कि हफ्ते में दो-तीन बार आती थीं, लेकिन हर बार पहले से थोड़ी करीब लगती थीं। जैसे कोई सच में नीचे से ऊपर की तरफ, बहुत धीरे-धीरे, चढ़ने की कोशिश कर रहा हो।

रोहित ने इस बात को नजरअंदाज करने की बहुत कोशिश की। पैसों की जरूरत इतनी ज्यादा थी कि नौकरी छोड़ना उसके लिए मुमकिन नहीं था। उसने अपने आप को समझाया कि ये सब उसका वहम है, अकेलेपन की वजह से दिमाग ऐसी चीजें बनाने लगा है।

लेकिन एक रात, कुछ ऐसा हुआ जिसने उसकी सारी सोच बदल दी।

रात के करीब साढ़े बारह बज रहे थे। एक अकेला ट्रक ड्राइवर पेट्रोल भरवाने आया, बहुत थका हुआ लग रहा था, बोला कि दिल्ली से आ रहा है और आगे मनाली जाना है। पेट्रोल भरते वक्त उसने अचानक रोहित से पूछा, यार, ये पीछे से आवाजें कैसी आ रही हैं, कोई फंसा है क्या वहां?

रोहित का दिल धक से रह गया। उसने पूछा, आपको भी सुनाई दे रही हैं?

ड्राइवर ने हां में सिर हिलाया, बोला, बिल्कुल साफ सुनाई दे रही हैं, लगता है कोई मदद मांग रहा है।

रोहित को समझ आ गया कि ये सिर्फ उसका वहम नहीं था, ये सच में हो रहा था। ड्राइवर पेट्रोल भरवाकर तुरंत निकल गया, बोला उसे यहां रुकना अच्छा नहीं लग रहा। रोहित अकेला रह गया, और आवाजें अब पहले से भी ज्यादा साफ और करीब आने लगी थीं।

उसने हिम्मत करके फिर से पीछे की दीवार के पास जाकर देखा। अंधेरे में उसे कुछ हिलता हुआ महसूस हुआ, नीचे खाई की तरफ से, जैसे कई सारे हाथ ऊपर की तरफ उठ रहे हों, चट्टानों को पकड़ने की कोशिश कर रहे हों। रोहित तुरंत पीछे हट गया और कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर लिया।

ठाकुर साहब का राज

अगली सुबह रोहित सीधा ठाकुर साहब के घर पहुंचा, बहुत डरा हुआ, बहुत परेशान। उसने पूरी बात बताई, यह भी बताया कि अब सिर्फ उसे नहीं, बल्कि ड्राइवर को भी वो आवाजें सुनाई दी थीं।

ठाकुर साहब बहुत देर तक चुप रहे, फिर एक गहरी सांस लेकर बोले, बेटा, सच बताऊं, तुमसे पहले भी चार लड़के इस पंप पर रात की ड्यूटी कर चुके हैं। सबने यही शिकायत की थी, और चारों ने कुछ ही हफ्तों में नौकरी छोड़ दी। एक लड़का तो इतना डर गया था कि उसी रात अपना सामान छोड़कर भाग गया, वापस लेने भी नहीं आया।

रोहित ने पूछा, फिर आपने ये बात मुझे पहले क्यों नहीं बताई?

ठाकुर साहब की आंखों में शर्मिंदगी थी, बोले, अगर बता देता तो तुम नौकरी के लिए कभी हामी नहीं भरते, और मुझे भी यहां कोई अटेंडेंट नहीं मिलता। ये पंप मेरे पिताजी का बनाया हुआ है, इसे बंद करना मेरे लिए मुमकिन नहीं है, पूरे परिवार का गुजारा इसी से चलता है।

रोहित को गुस्सा तो आया, लेकिन उसने देखा कि ठाकुर साहब की मजबूरी भी सच में बड़ी थी। उसने पूछा, तो अब क्या करूं मैं?

ठाकुर साहब ने बताया कि गांव के पुराने पंडित जी हैं जो हर साल उस जगह पर एक छोटी सी पूजा करवाते हैं, ताकि उन आत्माओं को कुछ शांति मिल सके, लेकिन ये पूरी तरह काम नहीं करता, हर कुछ महीनों में आवाजें फिर से शुरू हो जाती हैं।

आखिरी रात

रोहित ने फैसला किया कि वो एक आखिरी बार उस जगह पर जाकर देखेगा। उसने पंडित जी से भी बात की, जिन्होंने उसे एक छोटी सी पूजा की विधि बताई और कुछ मंत्र दिए, कहा कि रात को खाई के किनारे जाकर ये मंत्र पढ़ना, शायद कुछ राहत मिले।

उस रात रोहित हिम्मत जुटाकर कमरे से बाहर निकला, हाथ में टॉर्च और पंडित जी का दिया हुआ छोटा सा ताबीज लेकर। रात के दो बज रहे थे, आवाजें फिर शुरू हो चुकी थीं, इस बार पहले से भी ज्यादा तेज, जैसे बहुत सारे लोग एक साथ चिल्ला रहे हों, मदद मांग रहे हों।

रोहित खाई के किनारे पहुंचा, टॉर्च की रोशनी नीचे की तरफ डाली। गहरे अंधेरे में कुछ साफ नहीं दिख रहा था, बस काली-काली चट्टानें और नीचे कहीं दूर हल्की सी हलचल का एहसास हो रहा था। उसने कांपते हाथों से मंत्र पढ़ना शुरू किया, जैसा पंडित जी ने सिखाया था।

कुछ देर तक आवाजें उसी तरह चलती रहीं, फिर धीरे-धीरे कम होने लगीं। रोहित को लगा शायद काम कर गया, शायद अब शांति मिल जाएगी। लेकिन तभी, एकदम अचानक, नीचे से एक बहुत तेज, बहुत साफ आवाज आई, बच्चे की आवाज, रोता हुआ, भैया, मुझे भी ऊपर ले चलो, मुझे भी घर जाना है।

रोहित का दिल टूट गया, डर के साथ-साथ एक गहरी तकलीफ भी महसूस हुई। उसने टॉर्च नीचे की तरफ और झुकाई, कुछ देखने की कोशिश की। तभी उसे महसूस हुआ जैसे किसी ठंडे, गीले हाथ ने उसका पैर पकड़ लिया हो, नीचे से, चट्टान के किनारे से।

Horror Story in Hindi – खाई के किनारे रोहित को पकड़ता रहस्यमयी हाथ

रोहित चीख के साथ पीछे हटा, टॉर्च हाथ से छूट गई और नीचे खाई में गिर गई। अंधेरे में उसे कुछ दिखना बंद हो गया, बस चारों तरफ से आवाजें बढ़ती जा रही थीं, पास आती जा रही थीं, जैसे बहुत सारे हाथ अब उसकी तरफ बढ़ रहे हों।

रोहित किसी तरह अंधेरे में लड़खड़ाते हुए कमरे की तरफ भागा, दरवाजा बंद किया, अंदर से कुंडी लगा दी। बाहर आवाजें देर तक गूंजती रहीं, फिर धीरे-धीरे शांत हो गईं।

सुबह जब ठाकुर साहब पहुंचे, रोहित कमरे के कोने में बैठा कांप रहा था, आंखों में एक ऐसा खालीपन था जो पहले कभी नहीं था। उसने ठाकुर साहब को कुछ नहीं बताया, बस इतना कहा कि अब वो ये नौकरी नहीं कर सकता।

उस दिन के बाद रोहित उस पंप पर कभी वापस नहीं गया। लेकिन गांव वाले कहते हैं कि कभी-कभी देर रात, अगर आप उस सुनसान मोड़ से गुजरें, तो पेट्रोल पंप के पीछे से आज भी कोई पुकारता हुआ सुनाई देता है, और कभी-कभी नई परछाई भी उस आवाज के साथ जुड़ जाती है, जो अब हमेशा के लिए वहीं रह गई है, उन बाकी आवाजों के साथ, नीचे उस गहरी, अंधेरी खाई में।

रोहित का आज तक कोई पता नहीं। ठाकुर साहब ने रोहित के घरवालों से भी संपर्क किया, लेकिन रोहित उसी सुबह के बाद कहीं गायब हो गया। वह ना तो आज तक घर पहुंचा है ना ही आज तक उसका कुछ पता चला है।

पेट्रोल पंप आज भी वहीं खड़ा है, नारकंडा की सुनसान सड़क पर। नया अटेंडेंट भी है, लेकिन वो रात को कभी अकेला बाहर नहीं निकलता, और पिछली दीवार की तरफ कभी नजर उठाकर नहीं देखता।

सीख

रोहित की ये कहानी सिर्फ एक डरावना किस्सा नहीं है, ये उन हजारों लोगों की भी कहानी है जो पैसों की मजबूरी में ऐसी जगहों पर अकेले काम करने चले जाते हैं जहां का सच पहले से पता नहीं होता। कभी-कभी हमारी जरूरत इतनी बड़ी होती है कि हम खतरे को नजरअंदाज कर देते हैं, ये सोचकर कि कुछ नहीं होगा। लेकिन कुछ सवाल पहले ही पूछ लेने चाहिए, कुछ जगहों की असलियत नौकरी लेने से पहले ही जान लेनी चाहिए, चाहे मजबूरी कितनी भी बड़ी क्यों ना हो। और सबसे बड़ी बात, जब भी घर से दूर, अकेले किसी अनजान जगह जाना पड़े, तो घरवालों से लगातार संपर्क बनाए रखना चाहिए, क्योंकि रोहित जैसे कितने ही लोग हैं जिनकी खबर तक घरवालों को कभी नहीं मिल पाती।

—समाप्त—

दोस्तों अगर आपका भी कोई दोस्त या रिश्तेदार घर से कही दूर नौकरी करता है, तो ये आपका काम है उसे सतर्क करना। हमारी यह कहानी अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के पास जरूर भेजें ताकि उनको भी कहानी के साथ साथ अच्छी सीख मिले।


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