मुरादाबाद की पीतल फैक्ट्री की ढलाई वाली रात: Factory Night Duty Horror Story in Hindi

अगर उस रात बलराम ने भट्टी की आंच कम होते हुए नजरअंदाज नहीं किया होता, तो शायद वो आज भी उस फैक्ट्री में काम कर रहा होता।


Factory Night Duty Horror Story in Hindi

पीतल नगरी की वो पुरानी फैक्ट्री

मुरादाबाद अपने पीतल के काम के लिए पूरे देश में मशहूर है। यहां की गलियों में जहां देखो वहां पीतल के बर्तन, मूर्तियां, सजावटी सामान बनाने का काम चलता रहता है।

बलराम की उम्र पच्चीस साल थी, और घर के हालात ठीक न होने की वजह से उसे दसवीं के बाद ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी।

कई जगह छोटी-मोटी मजदूरी करने के बाद आखिरकार उसे शहर के बाहरी इलाके में एक पुरानी पीतल ढलाई फैक्ट्री में काम मिल गया।

फैक्ट्री का नाम था “शिवशंकर मेटल वर्क्स”, लेकिन इलाके के लोग उसे बस “पुरानी भट्टी वाली फैक्ट्री” कहकर बुलाते थे। ये फैक्ट्री तीन पीढ़ियों से चल रही थी, मालिक के दादा ने शुरू की थी, और तब से लेकर आज तक यहां एक अजीब सा नियम चला आ रहा था – “भट्टी कभी बुझनी नहीं चाहिए,” चाहे कुछ भी हो जाए, चौबीसों घंटे, तीनों सौ पैंसठ दिन।

बलराम को रात की शिफ्ट में लगाया गया था, उसका काम था भट्टी की आंच पर नजर रखना, उसमें कोयला और लकड़ी डालते रहना, और पिघले हुए पीतल को सही तापमान पर बनाए रखना ताकि सुबह कारीगर उससे ढलाई का काम शुरू कर सकें।

पहले दिन जब उसे ट्रेनिंग दी जा रही थी, फैक्ट्री के पुराने सुपरवाइजर हरिशंकर ने उसे बहुत गंभीरता से समझाया था, “बेटा, याद रखना, भट्टी की आंच कभी कम मत होने देना। चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे कैसी भी आवाज सुनाई दे, आंच तेज बनाए रखनी है। ये सिर्फ काम की बात नहीं है, ये फैक्ट्री का सबसे पुराना नियम है।

“बलराम ने हंसते हुए पूछा था, “क्यों भाई साहब, आंच कम होने से क्या हो जाएगा?”

हरिशंकर का चेहरा उस वक्त गंभीर हो गया था, उन्होंने बस इतना कहा, “मत पूछो, बस जो कहा वो करो।“ इसके बाद उन्होंने बात बदल दी थी।

पहले कुछ हफ्ते सब कुछ सामान्य

बलराम के लिए शुरुआती हफ्ते बिल्कुल सामान्य गुजरे। रात आठ बजे शिफ्ट शुरू होती, वो भट्टी के पास बैठकर उसकी आंच पर नजर रखता, बीच-बीच में कोयला डालता, कभी-कभी झपकी भी आ जाती लेकिन आंच की गर्मी और भट्टी से निकलने वाली रोशनी की वजह से वो जल्दी जाग भी जाता।

भट्टी बहुत बड़ी थी, पुराने ईंटों से बनी हुई, ऊपर से एक बड़ा सा मुंह था जिसमें से आंच की लपटें और धुआं निकलता रहता था। रात के सन्नाटे में जब पूरी फैक्ट्री खाली होती, बस भट्टी की गड़गड़ाहट की आवाज गूंजती रहती, कभी-कभी अंदर पिघल रहे पीतल के हल्के से उबलने की आवाज भी सुनाई देती।

बलराम को ये काम पसंद आने लगा था। तनख्वाह ठीक-ठाक थी, काम मुश्किल नहीं था, बस जागते रहना और भट्टी का ध्यान रखना भर था।

जिस रात आंच अपने आप कम होने लगी

करीब तीन हफ्ते बाद, एक रात, बलराम भट्टी के पास बैठा अपने फोन में कुछ देख रहा था। घड़ी में करीब रात के दो बज रहे थे, फैक्ट्री में पूरा सन्नाटा था, बाहर सड़क पर भी कोई आवाजाही नहीं थी।

अचानक उसे महसूस हुआ कि भट्टी से आने वाली गर्मी थोड़ी कम हो गई है। उसने ऊपर देखा तो पाया कि जो आंच पहले तेज लपटों के साथ जल रही थी, वो अब धीमी पड़ने लगी थी, जैसे भट्टी में हवा जाने का रास्ता किसी ने बंद कर दिया हो।

बलराम हैरान हुआ। उसने अभी कुछ देर पहले ही ठीक से कोयला डाला था, ऐसा कोई कारण नहीं था कि आंच अपने आप कम होने लगे। वह तुरंत उठकर भट्टी के पास गया, कोयला डालने की कोशिश की, हवा की नली को चेक किया, सब कुछ ठीक लग रहा था, फिर भी आंच धीरे-धीरे और कमजोर होती जा रही थी।

उसने हरिशंकर की बात याद की, “आंच कभी कम मत होने देना।“ घबराहट में उसने कोयले की मात्रा बढ़ा दी, हवा की नली को पूरा खोल दिया। कुछ देर के लिए आंच थोड़ी तेज हुई, लेकिन फिर वापस वैसी ही धीमी पड़ने लगी।

भट्टी के अंदर से आती वो आवाज

आंच की धीमी लपटों के बीच, बलराम को कुछ और भी महसूस होने लगा। भट्टी के अंदर से, पिघलते हुए पीतल की हल्की उबलने की आवाज के बीच, उसे कुछ और भी सुनाई देने लगा। बहुत धीमा, बहुत अस्पष्ट, लेकिन जैसे-जैसे वो ध्यान से सुनने लगा, उसे यकीन होने लगा कि वो सिर्फ धातु के पिघलने की आवाज नहीं थी।

कोई बोल रहा था। बहुत धीमे स्वर में, इतना धीमा कि शब्द समझ में नहीं आ रहे थे, लेकिन लय ऐसी थी जैसे कोई इंसान बात कर रहा हो, धीरे-धीरे, लगातार, जैसे कोई बहुत पुरानी बात दोहरा रहा हो, बार-बार।

बलराम के रोंगटे खड़े हो गए। उसने भट्टी से थोड़ा पीछे हटकर ध्यान से सुनने की कोशिश की। आवाज साफ नहीं थी, लेकिन उसमें एक इंसानी लय जरूर थी, जैसे कोई बहुत नीचे से, बहुत गहराई से बोल रहा हो, धातु की गर्मी और गड़गड़ाहट के परदे के पीछे से।

उसने खुद को समझाने की कोशिश की। शायद ये पिघलते हुए धातु के बुलबुलों की आवाज है, शायद हवा भट्टी की नली से गुजरते हुए अजीब आवाज बना रही है। लेकिन जितना वो सुनता गया, उतना ही उसे यकीन होता गया कि ये सिर्फ भौतिक आवाज नहीं थी।

जब पहली बार शब्द समझ आया

करीब आधे घंटे तक बलराम भट्टी से दूर खड़ा रहा, हिम्मत जुटाने की कोशिश करता रहा कि वापस पास जाए और अपना काम करे। आखिरकार उसने खुद को समझाया कि नौकरी जरूरी है, ये सब उसका वहम है, और वो वापस भट्टी के पास आ गया।

जैसे ही वो करीब पहुंचा, कोयला डालने के लिए झुका, वो आवाज अचानक साफ हो गई, बिल्कुल एक पल के लिए, जैसे किसी ने वॉल्यूम अचानक बढ़ा दिया हो। और इस बार बलराम को एक शब्द बिल्कुल साफ सुनाई दिया, भट्टी के अंदर से, धातु के पिघलने की गड़गड़ाहट के बीच से।

“ठंडा… ठंडा मत करना…”

बलराम के हाथ से कोयले का फावड़ा गिर गया। वो पीछे की तरफ लड़खड़ा गया, दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने चारों तरफ देखा, फैक्ट्री बिल्कुल खाली थी, कोई इंसान नहीं था आसपास। आवाज सिर्फ भट्टी के अंदर से आई थी।

उसने हिम्मत करके फिर से सुनने की कोशिश की, लेकिन अब सिर्फ सामान्य गड़गड़ाहट की आवाज थी, कोई शब्द नहीं, कोई इंसानी लय नहीं। जैसे वो सब कुछ बस एक पल के लिए था, और अब गायब हो गया था।

अगली सुबह जब सवाल पूछे गए

बलराम की वो रात बहुत मुश्किल से गुजरी। सुबह जैसे ही उसकी शिफ्ट खत्म हुई, वो हरिशंकर के पास गया, जो सुबह की शिफ्ट संभालने आए थे।

“भाई साहब, रात को कुछ अजीब हुआ। भट्टी की आंच अपने आप कम होने लगी, और मुझे लगा जैसे अंदर से कोई बोल रहा है।”

हरिशंकर का चेहरा एकदम से बदल गया। उन्होंने अपने आसपास देखा, जैसे देख रहे हों कि कोई और सुन तो नहीं रहा, फिर बलराम को थोड़ा एक तरफ ले गए।

“क्या सुना तुमने?” उनकी आवाज में एक अजीब सी गंभीरता थी।

बलराम ने बताया, “ठंडा मत करना, ऐसा कुछ कहा।“

हरिशंकर कुछ देर चुप रहे, फिर लंबी सांस ली। “ये फैक्ट्री साठ साल पुरानी है। शुरुआत में यहां एक कारीगर काम करता था, नाम था केदार। बहुत मेहनती था, भट्टी का बहुत ख्याल रखता था। एक बार सर्दियों में उसकी तबीयत खराब हो गई, बुखार बहुत तेज था, फिर भी वो ड्यूटी पर आया क्योंकि मालिक ने बहुत सख्ती की थी कि भट्टी बुझनी नहीं चाहिए।“ वरना तुम्हे नौकरी से निकाल दूँगा।

“उस रात वो भट्टी के पास ही बेहोश हो गया और तबीयत इतनी खराब हो गई कि सुबह तक उसकी मौत हो गई, भट्टी के ठीक बगल में पड़े-पड़े। कहते हैं मरने से पहले वो बस यही बुदबुदाता रहा, ‘भट्टी ठंडी मत होने देना, भट्टी ठंडी मत होने देना।‘ उसके बाद से ये नियम बन गया कि भट्टी कभी बुझनी नहीं चाहिए।”

बलराम का शरीर सुन्न पड़ गया। “तो क्या वो अभी भी… भट्टी में…?”

हरिशंकर ने कंधे उचकाए, आंखों में एक अजीब सी थकान थी। “मुझे नहीं पता बेटा। बस इतना जानता हूं कि जो भी इस नौकरी में आया, कुछ महीनों बाद उसने भी यही बात सुनी। कुछ लोगों ने काम छोड़ दिया, कुछ ने बस अनसुना करना सीख लिया।

जब आवाज ने बुलाना शुरू किया

बलराम ने नौकरी नहीं छोड़ी, पैसों की जरूरत बहुत ज्यादा थी। लेकिन अगले कुछ हफ्तों में वो आवाज उसे बार-बार सुनाई देने लगी, हर बार जब आंच जरा भी कम होती, वही धीमा स्वर भट्टी के अंदर से गूंजने लगता, “ठंडा मत करना।“

धीरे-धीरे बलराम को महसूस होने लगा कि वो आवाज अब सिर्फ आंच कम होने पर नहीं, बल्कि बीच-बीच में यूं ही भी सुनाई देने लगी थी।

एक रात, आंच बिल्कुल सामान्य तेजी से जल रही थी, फिर भी बलराम को वो आवाज सुनाई दी, और इस बार शब्द बदल चुके थे। “साथ रहो… यहीं रहो…”

बलराम ने उस रात अपनी सीट भट्टी से थोड़ा दूर कर ली, लेकिन आवाज उसका पीछा करती रही, दूरी से कोई फर्क नहीं पड़ा। जितनी दूर वो बैठता, आवाज उतनी ही साफ उसके कानों तक पहुंचती।

आखिरी रात

उस रात उसकी शिफ्ट के बाद जब सुबह वाला कारीगर फैक्ट्री पहुंचा, तो उसने पाया कि भट्टी की आंच सामान्य से कहीं ज्यादा तेज जल रही थी, इतनी तेज कि आसपास की हवा भी गर्म महसूस हो रही थी।

बलराम वहां नहीं था। उसका बैग, उसका फोन, सब कुछ भट्टी के पास ही रखा हुआ था, बिल्कुल वैसे ही जैसे वो हमेशा रखता था, लेकिन बलराम खुद कहीं नहीं मिला। फैक्ट्री का हर कोना छान मारा गया, आसपास की सड़कें, गांव, कहीं कोई सुराग नहीं मिला।

पुलिस आई, जांच हुई, लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा। बलराम के घरवाले महीनों तक उसे ढूंढते रहे, लेकिन आखिरकार उन्होंने भी उम्मीद छोड़ दी।

फैक्ट्री में आज भी रात की शिफ्ट के लिए नए लोग रखे जाते हैं। हरिशंकर अब बहुत कम बात करते हैं इस बारे में, बस इतना कहते हैं नए लोगों को, “आंच कभी कम मत होने देना,” चाहे कुछ भी हो जाए।“ जब कोई पूछता है कि क्यों, तो वो बस चुप हो जाते हैं, और नजरें भट्टी की तरफ घुमा लेते हैं,

जो आज भी दिन-रात जलती रहती है, बिना रुके, बिना बुझे।

—समाप्त—


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