शाम के 7 बजे के बाद उस ऑफिस में कोई नहीं रुकता था। वजह किसी को नहीं पता थी, लेकिन वहां काम करने वाला हर शख्स इस नियम को जानता था।
उस रात तेज बारिश के कारण विवेक को मजबूरी में उसी सुनसान ऑफिस में रुकना पड़ा। रात के 9 बजे तक सब कुछ सामान्य था… फिर अचानक खाली गलियारे से किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई दी।
विवेक को क्या पता था कि उस रात ऑफिस में उसके अलावा कोई और भी वहाँ मौजूद था। पढ़िए यह पूरी Night Shift Horror Story in Hindi।
7 बजे के बाद ऑफिस में रुकना मना था: Night Shift Horror Story in Hindi👇
एक अनोखा नियम
दिल्ली के उस पुराने और वीरान इलाके में बनी प्राइवेट कंपनी में काम करते हुए विवेक को अभी मुश्किल से तीन महीने ही हुए थे।
बिल्डिंग देखने में बहुत ही सुंदर थी। पर यहां का एक नियम ऐसा था जो हर नए एम्प्लॉई के कान में पहले ही दिन फूँक दिया जाता था—“शाम सात बजे के बाद इस बिल्डिंग में रुकना सख्त मना है, चाहे आपका कितना भी जरूरी काम क्यों न फंसा हो।“
शुरुआत में विवेक को यह किसी बचकाने ऑफिस रूल या मालिक के अजीब नखरे से ज्यादा कुछ नहीं लगा था। कॉर्पोरेट की दुनिया में लेट नाइट सिटिंग आम बात होती है, फिर यहाँ ऐसा क्या था?
जब उसने एक दिन हिम्मत करके अपने सीनियर से इसकी वजह पूछनी चाही, तो उस सीनियर का चेहरा पीला पड़ गया था। उसने बात को झट से टालते हुए कहा था, “बस कंपनी की पॉलिसी है भाई, ज्यादा मत सोचो।“
आज शाम विवेक अपने डकाम में बहुत व्यस्त था। कल सुबह क्लाइंट को फाइनल प्रेजेंटेशन देनी थी और काम अभी आधा बाकी था। वो काम की गहराई में इतना खोया था कि वक्त का ख्याल ही नहीं रहा।
तभी अचानक पियोन रामलाल उसकी टेबल के पास आकर रुक गया। उसके चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें थीं।
“साहब, साढ़े छह बज गए हैं। जल्दी से घर चले जाइए, सात बजने वाले हैं। सात बजे के बाद यहां रुकना अलाउड नहीं है, ये कंपनी का सख्त नियम है।“
विवेक ने घड़ी देखी और चौंक गया। “हां हां, बस मैं पंद्रह मिनट में निकल रहा हूं। ये काम बस खत्म होने वाला है।“
रामलाल – ठीक है साहब मै चलता हूं, ये लीजिए गेट की चाबी, जाते वक़्त गेट बंद कर देना और आप भी सात बने से पहले निकल जाना।
विवेक – “हाँ ठीक है”।
बारिश ने रास्ता रोक दिया

पंद्रह मिनट बाद विवेक अपना बैग उठाकर नीचे उतरा। घड़ी में 6:45pm हो चुके थे। बाहर निकलते ही उसे पता चला कि बारिश बहुत तेज हो चुकी थी। सड़कों पर पानी भर गया था, इतना कि पैदल चलना भी मुश्किल हो रहा था।
विवेक इधर-उधर देखने लगा, कोई रिक्शा या ऑटो मिल जाए तो घर पहुंच जाए। लेकिन इतनी तेज बारिश में सड़क बिल्कुल सुनसान थी। कोई भी साधन नजर नहीं आ रहा था। देखते ही देखते घड़ी में छह बजकर पचास मिनट हो गए। विवेक को अब घबराहट होने लगी थी।
तभी उसके फोन की घंटी बजी। उसकी प्रेमिका काजल का फोन था।
“हैलो विवेक, कहां पहुंचे तुम?”
“अरे यार क्या बताऊं, अभी ऑफिस के बाहर ही हूं, बारिश में फंस गया हूं। कोई रिक्शा भी नहीं मिल रहा।“
काजल ने चिंता जताई, “ठीक है, संभलकर रहना, ज्यादा भीगना मत।“
विवेक ने फोन रखा और फिर से इंतजार करने लगा। लेकिन बारिश थमने का नाम ही नहीं ले रही थी। अंधेरा भी गहराता जा रहा था। सात बज चुके थे, फिर भी कोई साधन नजर नहीं आया।
आखिरकार, बहुत देर इंतजार करने के बाद, थका-हारा विवेक वापस बिल्डिंग की तरफ मुड़ गया। उसने सोचा, चलो कुछ देर अंदर बैठकर बारिश रुकने का इंतजार करता हूं। बिल्डिंग के गेट की चाबी आज उसके पास ही थी।
“चलो, आज तो ऑफिस में ही रात गुजारनी पड़ेगी,” उसने खुद से बुदबुदाते हुए कहा।
अंधेरे ऑफिस में अकेला विवेक
विवेक अपने केबिन में वापस पहुंच गया। पूरी बिल्डिंग में सन्नाटा पसरा हुआ था। बारिश की वजह से बिजली भी हल्की-हल्की टिमटिमा रही थी, कभी जाती, कभी वापस आती। उसने अपने डेस्क की लैंप जला ली और कुर्सी पर बैठ गया।
अकेलापन और बारिश की आवाज से थोड़ा असहज महसूस करते हुए, उसने काजल को फिर से फोन लगाया। बातें करने से मन थोड़ा हल्का हो जाता है, यही सोचकर उसने बात शुरू की।
“यार काजल, आज तो फंस ही गया। सोचा नहीं था कि यहीं रात गुजारनी पड़ेगी।“
काजल हंसने लगी, “अरे कोई बात नहीं, मेरे साथ बात करते रहो, टाइम का पता भी नहीं चलेगा।
दोनों बातें करने लगे, प्यार भरी बातें, शादी की प्लानिंग, आगे की जिंदगी के सपने। समय धीरे-धीरे बीतने लगा। घड़ी में आठ बज चुके थे। विवेक को इस बात का एहसास तक नहीं हुआ कि बाहर बारिश और भी तेज हो गई थी, और पूरी बिल्डिंग में अब सिर्फ उसी के केबिन की लाइट जल रही थी।
जब पहली बार सुनाई दी वो रोने की आवाज

बातें करते-करते नौ बज गए। तभी अचानक विवेक को कुछ सुनाई दिया। बहुत हल्की सी आवाज, जैसे कोई दूर कहीं रो रहा हो। एक औरत की सिसकियां, धीमी लेकिन साफ सुनाई देने वाली।
“एक मिनट काजल,” उसने फोन थोड़ा हटाते हुए कहा, “कुछ आवाज आ रही है, लगता है कोई रो रहा है।“
“क्या? इतनी रात को? कौन होगा वहां?” काजल की आवाज में हैरानी थी।
विवेक उठा और अपने केबिन के दरवाजे तक गया। बाहर गलियारे में झांककर देखा। पूरा गलियारा अंधेरे में डूबा हुआ था, सिर्फ इमरजेंसी लाइट की हल्की सी रोशनी थी।
“कौन है वहां?” उसने आवाज लगाई।
कोई जवाब नहीं आया। रोने की आवाज भी अचानक बंद हो गई, जैसे कभी थी ही नहीं।
विवेक ने कंधे उचकाए और वापस अपनी कुर्सी पर आ बैठा। “शायद बारिश की आवाज होगी, उसने खुद को समझाते हुए फोन उठाया। “कुछ नहीं था काजल, शायद बारिश की आवाज की वजह से ऐसा लगा कि कोई है।
दोनों फिर से बातें करने लगे।
हंसी की वो आवाज जिसने रूह कंपा दी
कुछ देर पंद्रह-बीस मिनट बाद, एक और आवाज गूंजी। इस बार हंसी की आवाज। एक औरत की हंसी, लेकिन इसमें कोई खुशी नहीं थी। ऐसी हंसी जो सुनते ही शरीर में सिहरन दौड़ा दे, ठंडी और खोखली।
विवेक का शरीर अकड़ गया। “काजल, फिर से कुछ आवाज आई। इस बार हंसने की।“
“विवेक, मुझे डर लग रहा है, तुम वहां से निकल क्यों नहीं जाते?”
“बारिश अभी भी बहुत तेज है, कैसे निकलूं,” विवेक ने कहा, लेकिन उसकी आवाज में अब पहले जैसा आत्मविश्वास नहीं था।
वो धीरे-धीरे उठा और गेट की तरफ बढ़ा। दरवाजा खोलकर बाहर झांका। गलियारा वैसा ही खाली था। “कौन है यहां?” उसने फिर पूछा, इस बार आवाज में हल्की कंपकंपी थी।
फिर से कोई जवाब नहीं आया। सन्नाटा, बस बारिश की बूंदों की आवाज खिड़कियों पर टकराती हुई।
विवेक वापस अंदर आया और दरवाजा बंद कर लिया। उसने अपने आप को समझाने की कोशिश की कि ये सब उसके दिमाग का वहम है, थकान की वजह से ऐसा लग रहा है। वो वापस अपनी कुर्सी पर बैठ गया और काजल से बातें जारी रखीं, हालांकि अब उसकी आवाज में पहले जैसी सहजता नहीं थी।
दरवाजे के बाहर कुछ घिसटने की आवाज
बातें करते-करते कुछ और समय बीता। फिर अचानक एक नई आवाज आई। कुछ घिसटने जैसी, जैसे कोई भारी चीज फर्श पर धीरे-धीरे खींची जा रही हो। ये आवाज सीधे उसके केबिन के दरवाजे के बाहर से आ रही थी।
खर्र… खर्र… खर्र…
विवेक का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। फोन हाथ में कांपने लगा। “काजल, ये आवाज… ये अलग है। कुछ घिसट रहा है बाहर।“
“विवेक, मुझे बहुत डर लग रहा है, तुम मुझसे बात करते रहो, कहीं मत जाना प्लीज।“
लेकिन विवेक के अंदर एक अजीब सा खिंचाव महसूस हो रहा था, जैसे कोई उसे उस आवाज की तरफ बुला रहा हो। उसके पैर खुद-ब-खुद उठे, जैसे उसका अपना दिमाग उसके शरीर पर काबू खो चुका हो।
“बस एक मिनट में आता हूं, देखकर,” उसने कहा और फोन डेस्क पर रख दिया, हालांकि कॉल अभी भी चालू थी।
वो धीरे-धीरे दरवाजे की तरफ बढ़ा। बाहर निकलते ही उसे वो घिसटने की आवाज साफ सुनाई दी, गलियारे के आखिर की तरफ से आ रही थी, जहां सीढ़ियां तहखाने की तरफ जाती थीं।
तहखाने का वो बंद कमरा
उसके पैर सीढ़ियों की तरफ बढ़ते गए। तहखाने में जाने का रास्ता कभी इस्तेमाल नहीं होता था, वहां पुराना सामान रखा जाता था, कोई वहां नहीं जाता था।
सीढ़ियां उतरते हुए हवा और ठंडी होती गई, इतनी ठंडी कि विवेक की सांसों की भाप दिखने लगी, जबकि बाहर उमस भरी बारिश थी। तहखाने में पहुंचते ही उसे एक बंद दरवाजा दिखा, पुराना, लकड़ी का, जिस पर धूल की मोटी परत जमी थी।
उस दरवाजे के नीचे से हल्की सी रोशनी छन रही थी, कांपती हुई, जैसे कोई मोमबत्ती जल रही हो।
विवेक का दिल कह रहा था वापस भाग जा, लेकिन उसके पैर उसकी नहीं सुन रहे थे। उसने धीरे से दरवाजे को धक्का दिया। दरवाजा चरमराते हुए खुल गया।
अंदर एक छोटा सा कमरा था, खाली, बस एक पुरानी टूटी हुई कुर्सी रखी थी। और उस कुर्सी के पास, हवा में हल्की सी धुंध जैसी कोई आकृति उभरने लगी। धीरे-धीरे वो आकृति साफ होती गई, एक औरत की शक्ल में बदलती गई।
सामने खड़ी थी वो जिसने अपनी कहानी सुनाई
विवेक के सामने अब एक साया साफ खड़ा था। एक जवान लड़की, बाल बिखरे हुए, आंखें गहरे गढ्ढे जैसी और चेहरा पीला पड़ा हुआ।
उसके पैर जमीन से पूरे दो इंच उपर उठे हुए थे, और वो बहुत ही भयानक तरीके से विवेक को घूर रही थी।
“त… तुम कौन हो? मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा? मुझे छोड़ दो, मेरे घर वाले मेरी राह देख रहे हैं,” विवेक की आवाज कांप रही थी, हाथ-पैर सुन्न पड़ने लगे थे।
उस साये ने विवेक की तरफ देखा, उसकी आंखों में गुस्से के साथ-साथ गहरा दर्द था।
“मेरा नाम सोनिया था,” उसने कहना शुरू किया। “बाईस साल की थी मैं, इसी ऑफिस में काम करती थी, तीन साल पहले। बहुत सपने थे मेरे, अच्छी जिंदगी जीने के, अपने परिवार को खुश रखने के।“
“मेरे बॉस की मुझ पर बहुत गंदी नजर थी। मैं जानती थी, महसूस करती थी, लेकिन नौकरी की मजबूरी में चुप रहती थी। एक दिन उसने मुझे काम का बहाना बनाकर देर तक रोक लिया। पूरी बिल्डिंग खाली हो चुकी थी, सिर्फ मैं और वो थे।“
सोनिया की आवाज कांपने लगी, आंखों में आंसू भर आए। “उसने मेरे साथ बहुत बुरा किया। मैंने चीखने की, बचने की पूरी कोशिश की, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था। कोई मदद के लिए नहीं आया। वो अपना काम करके चला गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो।“
“उस रात मैं इसी कमरे में आई थी, अकेली, टूटी हुई, शर्मिंदा, और बेबस। मुझे लगा मेरी पूरी जिंदगी खत्म हो गई है, मेरी इज्जत, मेरे सपने, सब कुछ। और मैंने यहीं अपनी जान दे दी।
जब बदला लेने की बारी आई
“उसके बाद से,” सोनिया की आवाज अब बदल गई थी, ठंडी और सख्त, “तब से जो भी सात बजे के बाद इस बिल्डिंग में रुका, मैंने उसे कभी जिंदा नहीं जाने दिया। मुझे इंसाफ नहीं मिला जिंदा रहते हुए, तो अब मैं अपना इंसाफ खुद लेती हूं।“
विवेक पीछे हटने की कोशिश करने लगा, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन में जड़ गए थे। “मैंने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा, मुझे जाने दो, प्लीज।“
सोनिया की आंखों से अब आंसू नहीं, बल्कि एक ठंडा, बेरहम गुस्सा झलक रहा था। हर वो इंसान जो यहां सात बजे के बाद रुकता है, वो मेरे उस ज़ख़्म को ताजा कर देता है, जो मुझे तीन साल पहले उस रात को मिला था।
उसकी शक्ल धीरे-धीरे बदलने लगी, खूबसूरत चेहरा विकृत होता गया, आंखें गहरे काले गड्ढों में बदल गईं, मुंह से एक भयानक, अमानवीय आवाज निकलने लगी।
विवेक चीखना चाहता था, लेकिन उसके गले से कोई आवाज नहीं निकली। सोनिया की आकृति उसकी तरफ बढ़ी, ठंडे, लंबे हाथों से उसने विवेक को जकड़ लिया। पूरे तहखाने में उसकी चीख गूंजी, लेकिन बाहर बारिश के शोर में वो कहीं दब गई।
सुबह जब सब कुछ खत्म हो चुका था
अगली सुबह, बारिश थम चुकी थी। ऑफिस के बाकी कर्मचारी जब पहुंचे, तो उन्हें विवेक का फोन उसके केबिन के डेस्क पर पड़ा मिला, स्क्रीन पर अभी भी काजल का नंबर दिख रहा था, कॉल का समय पूरी रात का दिखा रहा था, हालांकि दूसरी तरफ से कोई आवाज घंटों से नहीं आई थी।
विवेक कहीं नहीं मिला। पूरी बिल्डिंग छान मारी गई, हर कमरा, हर कोना, लेकिन विवेक का कोई पता नहीं चला। पुलिस बुलाई गई, तहखाने की तलाशी हुई।
उस बंद कमरे में, जहां सालों से कोई नहीं गया था, वहां फर्श पर कुछ पुरानी चूड़ियां मिलीं, टूटी हुई, धूल में सनी हुई। और उनके पास ही, विवेक का जूता पड़ा मिला।
रामलाल, जो सालों से इस बिल्डिंग में पियोन का काम कर रहा था, उस दिन के बाद किसी से कुछ नहीं कहता। बस इतना कहता है, “मैंने कहा था साहब को, सात बजे के बाद यहां मत रुकिएगा। ये नियम यूं ही नहीं बना था।“
—समाप्त—
कहानी से सीख:
विवेक की ये घटना हमें याद दिलाती है कि कुछ नियम बिना वजह नहीं बनते, और कुछ दर्द इतना गहरा होता है कि वो सालों बाद भी शांत नहीं होता। जब किसी की चीख को अनसुना कर दिया जाता है, जब इंसाफ नहीं मिलता, तो वो दर्द कभी-कभी ऐसी शक्ल ले लेता है जो पीछे छूट जाने वालों के लिए बहुत भारी पड़ जाता है।
अगर आपके ऑफिस या आसपास भी कोई ऐसा अजीब नियम है जिसकी वजह किसी को नहीं पता, तो हो सकता है उसके पीछे भी कोई ऐसी ही अनकही कहानी छिपी हो। ऐसे नियमों को हल्के में मत लीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल-जवाब (FAQs)
1. Night Shift Horror Stories क्या होती है?
यह रात में होने वाली डरावनी घटनाओं पर आधारित हॉरर कहानियाँ होती है।
2. क्या रात में ऑफिस में अकेले काम करना सुरक्षित है?
अकेले काम करते समय सुरक्षा का ध्यान रखना जरूरी है। देर रात ऑफिस में रुकने पर किसी भरोसेमंद व्यक्ति को जरूर बताएं।
3. ऑफिस में किसी अजीब नियम को नजरअंदाज क्यों नहीं करना चाहिए?
किसी नियम की वजह पता न हो, तब भी उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। उसके पीछे कोई जरूरी सुरक्षा कारण हो सकता है।
4. क्या यह कहानी सच्ची घटना पर आधारित है?
नहीं, यह एक काल्पनिक हॉरर कहानी है, जिसे सिर्फ मनोरंजन और सीख के लिए लिखा गया है।
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अगर आपको भी कभी ऑफिस या किसी सुनसान जगह पर देर रात कुछ अजीब महसूस हुआ हो, तो हमें कमेंट में जरूर बताइए। और इस कहानी को उन सभी दोस्तों के साथ शेयर करें जो अक्सर देर रात तक ऑफिस में रुकते हैं।
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