रात 2 बजे जंगल में आई माँ की आवाज़ | भूतिया कहानी Part 2

अंकित जंगल में माँ की आवाज़ के पीछे चला गया, लेकिन उसने लौटकर दोस्तों को जो बताया, उसने सभी को डरा दिया। पढ़िए इस भूतिया कहानी का Part 2।


तो दोस्तों, आप पढ़ रहे हैं “रात 2 बजे जंगल में आई माँ की आवाज़ भूतिया कहानी का Part 2”। पिछले भाग में अंकित अपनी माँ की आवाज़ सुनकर आधी रात को जंगल की ओर चला गया था। अब आगे क्या हुआ, आइए जानते हैं…

अगर आपने अभी तक रात 2 बजे जंगल में आई माँ की आवाज़ भूतिया कहानी का part 1 नहीं पढ़ा है तो कृपया पहले part 1 पढ़े जिससे आपको part 2 पढ़ने में और भी ज्यादा मजा आए।

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अगर आपने part 1 पढ़ लिया है, तो आगे की कहानी पढ़ना जारी रखें…


रात 2 बजे जंगल में आई माँ की आवाज़ | भूतिया कहानी Part 2

कहानी की शुरुआत

गर्दन आधी ही मुड़ी थी कि पीछे कुछ हिला — पत्तों की सरसराहट, बहुत पास से। अंकित ने पीछे पूरी तरह मुड़ने की हिम्मत जुटाई, और टॉर्च की रोशनी उस तरफ घुमाई।

कुछ नहीं था। सिर्फ एक झाड़ी हल्के से हिल रही थी, मानो जैसे अभी-अभी कोई उसमें से निकला हो।

उसने पीछे हटने की कोशिश की, पैर लड़खड़ाया, टॉर्च हाथ से छूट गई — ज़मीन पर गिरते ही बंद हो गई। अब सिर्फ अंधेरा था, और उसकी अपनी सांसों की आवाज़, तेज़ और उखड़ी हुई।

वो भागा। किस दिशा में, ये भी ठीक से पता नहीं था — बस भागा। पेड़ों से टकराते-टकराते, टहनियां चेहरे पर लगती रहीं, एक बार पैर किसी जड़ में उलझा और वो गिरते-गिरते बचा।

पीछे, दूर से, वही आवाज़ फिर आई — मगर अब वो माँ की आवाज़ नहीं थी। कुछ और था उसमें, जैसे कोई नकल कर रहा हो।

उधर कैंप में, प्रिया की आँख खुली — वो पेशाब के लिए उठी थी। टेंट से बाहर निकली तो देखा लड़कों वाला टेंट का ज़िप खुला पड़ा है, हवा में हल्का सा फड़फड़ा रहा है।

उसने अंदर झांका — रोहित और सुमित सो रहे थे, अंकित की जगह खाली थी, स्लीपिंग बैग भी वैसे ही पड़ा था।

उसने पहले सोचा शायद वो वॉशरूम गया होगा पेड़ों की तरफ। दो मिनट इंतज़ार किया। फिर पांच। अब उसे घबराहट हो रही थी, फिर उसने रोहित को हिलाकर जगाया।

“अंकित नहीं दिख रहा,” उसकी आवाज़ में घबराहट साफ थी।

तीनों बाहर निकल आए, टॉर्च लेकर। अंकित का फोन टेंट में ही पड़ा था, चार्जिंग पर लगा हुआ। “बिना फोन के गया है? कहाँ जाएगा इतनी रात को?” सुमित ने कहा, उसकी आवाज़ में नींद मिली हुई थी।

उन्होंने आवाज़ें दीं — “अंकित! अंकित भाई!” जंगल की तरफ से कोई जवाब नहीं आया, सिर्फ उनकी अपनी आवाज़ें गूंजकर वापस आती रहीं।

रोहित आगे बढ़ने लगा जंगल की तरफ, प्रिया ने हाथ पकड़ लिया। “अकेले मत जाओ, साथ चलते हैं।“ तीनों साथ में बढ़े, टॉर्च की रोशनी इधर-उधर घुमाते हुए।

करीब बीस मिनट बाद उन्हें ज़मीन पर पड़ी अंकित की टॉर्च मिली, बंद पड़ी हुई। सुमित ने उठाई, ऑन करने की कोशिश की — नहीं जली।

“अंकित!” प्रिया जोर से चिल्लाई, उसकी आवाज़ अब रोने जैसी हो रही थी।

दूर से, बहुत हल्की सी, एक आवाज़ वापस आई — “यहाँ हूँ…”

रोहित उस दिशा में बढ़ने ही वाला था कि सुमित ने रोक लिया। “रुक। कहां जा रहा है? ये अंकित की आवाज़ नहीं है।“

वो सही था — आवाज़ में कुछ अजीब था।

तीनों वहीं रुक गए, एक-दूसरे से सटकर, टॉर्च चारों तरफ घुमाते हुए। कोई फैसला नहीं ले पा रहे थे — आगे बढ़ें या वापस कैंप जाएं।

तभी दाईं तरफ से, बिल्कुल पास से, कुछ भागने की आवाज़ आई — तेज़ कदम, सूखे पत्तों पर। तीनों की टॉर्च उस तरफ घूमी।

अंकित था। भागता हुआ, कपड़े जगह-जगह से फटे, चेहरे पर खरोंचें। उसने उन्हें देखते ही खुद को रोका, सांस फूली हुई थी, बोल नहीं पा रहा था कुछ देर तक।

“कहाँ गया था तू?” सुमित ने लगभग चिल्लाते हुए पूछा, गुस्सा और राहत दोनों आवाज़ में।

अंकित ने घबराती हुई आवाज में सिर्फ इतना ही कहा कि “जल्दी चलो यहाँ से”।

मुझे लगा कि “माँ की आवाज़… है, मुझे माँ बुला रही है… मैं…” उसने पीछे मुड़कर देखा, अंधेरे की तरफ। और कहा “जल्दी चलो”।

किसी ने और आगे कुछ नहीं पूछा। सब चुपचाप कैंप की तरफ लौट आए, जितनी तेज़ी से हो सके।

बाकी की रात किसी को नींद नहीं आई। चारों एक ही टेंट में बैठे रहे, बत्ती जलाए, सुबह होने का इंतज़ार करते हुए।

सुमित ने कुछ पूछने की कोशिश की लेकिन अंकित ज़्यादा कुछ नहीं बोला, बस वो पूरी रात काँपता रहा।

जैसे-तैसे सुबह ही, सुबह होते ही उन्होंने अपना सामान समेटा और निकल गए, प्लान से एक दिन पहले ही। रास्ते में जिस दुकान से उन्होंने पानी की बोतलें ली थीं, वहां के दुकानदार ने अंकित को देखकर कुछ पल रुककर पूछा — “रात को आवाज़ सुनी थी क्या?” अंकित सुन्न हो गया।

किसी ने जवाब नहीं दिया, वो बस चुपचाप गाड़ी में बैठ गए।

घर लौटकर सब अपनी-अपनी ज़िंदगी में वापस लग गए। अंकित ने उस रात का ज़िक्र दोबारा किसी से नहीं किया, और कोशिश करता कि याद भी न आए।

—समाप्त—

मेरे पापा की दी हुई सीख:

“जरूरी नहीं कि अंकित बच के आ गया तो आप भी बचकर आ जाएंगे।“

इसलिए कभी भी रात में किसी की आवाज सुनकर तुरंत बाहर ना निकले, कभी-कभी वो आवाज आपके ही किसी परिवार के सदस्य के रूप में भी आ सकती है।

वो आवाज किसी की भी हो सकती है, वो आवाज किसी भटकती हुई आत्मा की भी हो सकती है या कोई चोर लुटेरे भी हो सकते है।

जो आपके दरवाजा खोलने के बाद आपके साथ कुछ भी हानि कर सकते है।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल-जवाब (FAQs)

1. जंगल या सुनसान इलाके में कैंपिंग करते वक़्त रात में अकेले बाहर निकलने से पहले क्या सावधानी रखनी चाहिए?

अकेले बाहर निकलने से बचें, किसी को जगाकर साथ ले जाएं। टॉर्च के अलावा फोन साथ रखें, और अनजान आवाज़ों या रोशनी की तरफ बिना सोचे-समझे न बढ़ें।

2. कैंपिंग ट्रिप के लिए ग्रुप इंश्योरेंस या ट्रैवल कवर लेना क्यों फायदेमंद है?

ग्रुप कैंपिंग या एडवेंचर ट्रिप में चोट, इमरजेंसी इवैक्युएशन या मेडिकल ज़रूरत की स्थिति आ सकती है। शॉर्ट-टर्म ट्रैवल इंश्योरेंस ऐसी अनहोनी स्थितियों में खर्च और मदद दोनों आसान बना देता है, खासकर तब, जब जगह नेटवर्क या शहर से दूर हो।


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