रात 2 बजे जंगल में माँ की आवाज़ सुनकर अंकित टेंट से बाहर निकल गया। आगे जंगल में उसके साथ क्या हुआ? पढ़िए यह रहस्यमयी भूतिया कहानी।
दोस्तों आज हम लेकर आए है, चार दोस्तों रोहित, सुमित, प्रिया और अंकित की ऐसी भूतिया कहानी जिसे पढ़कर आपके अंदर तक के रोंगटे खड़े हो जाएंगे, और आप अकेले बाहर निकलना भूल जाएंगे, और अंत में ये कहानी ऐसी सीख दे जाने वाली है जो कि आपको हमेशा याद रहेगी।
दोस्तों ये सीख मुझे मेरे पापा ने दी थी। जो मुझे आज तक याद है। तो चलिए इस रहस्यमयी भूतिया कहानी को पूरा पढ़ते है, और देखते है वो सीख क्या है, जो मेरे पापा ने मुझे दी थी।
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रात 2 बजे जंगल में आई माँ की आवाज़ | भूतिया कहानी की शुरुआत 👇
“वो आवाज”
चार दोस्त थे — रोहित, सुमित, प्रिया और अंकित। कॉलेज खत्म हुए दो साल हो गए थे, सबकी नौकरी अलग-अलग शहर में लग गई थी, तो साल में एक बार मिलना जैसे रिवाज़ बन गया था। इस बार अंकित ने प्लान बनाया — “चलो कुछ नया करते हैं, जंगल के पास कैंपिंग।“
जगह उसने खुद ढूंढी थी, इंस्टाग्राम पर किसी ट्रैवल पेज से — एक छोटी नदी के किनारे, जंगल के थोड़ा सा बाहर, फॉरेस्ट डिपार्टमेंट का परमिशन वाला कैंपिंग स्पॉट। फोटो में सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा था। बुकिंग के वक़्त फोन पर एक आदमी ने बस इतना कहा था — “सूरज ढलने के बाद ज़्यादा दूर मत निकलिएगा, जंगल का इलाका है।“
शनिवार दोपहर तक वो पहुंच गए। जगह सच में अच्छी थी — पेड़ों के बीच एक खुला मैदान जैसा हिस्सा, पास में नदी बह रही थी, हल्की सी आवाज़ के साथ। उन्होंने दो टेंट लगाए, एक लड़कों का, एक प्रिया का — हालांकि प्रिया ने कहा भी था, “अकेले सोना पड़ेगा तो डर लगेगा,” जिसे सबने हंसी में उड़ा दिया।

शाम को कैंपफ़ायर जलाई गई, मैगी बनाई, गाने बजाए फोन पर स्पीकर से। रात के नौ-दस बजे तक माहौल बिल्कुल normal था — हंसी मज़ाक, पुरानी कॉलेज की बातें, कौन लड़की किस लड़के को और कौन लड़का किस लड़की को पसंद करता था वो सब। सुमित ने डरावनी कहानी सुनाने की कोशिश की, मगर इतनी घिसी-पिटी थी कि सब हंस पड़े।
रात करीब साढ़े ग्यारह बजे सब सोने चले गए। रोहित, सुमित और अंकित एक टेंट में, प्रिया दूसरे में। बाहर कैंपफ़ायर धीरे-धीरे बुझ रही थी, बस अंगारे चमक रहे थे।
अंकित की नींद हल्की थी, उसे हमेशा से नींद कम आती थी। रात को दो बजे के आसपास उसकी आँख खुली — टेंट के अंदर सुमित और रोहित गहरी नींद में थे, सुमित हल्के खर्राटे भी ले रहा था।
वो कुछ देर यूं ही लेटा रहा, फोन उठाकर टाइम देखा — 2:07, फिर से आँखें बंद करने ही वाला था कि उसे कुछ सुनाई दिया।
“अंकित…”
बहुत हल्की आवाज़। पहले तो लगा शायद कोई जानवर होगा। मगर फिर से आई — “अंकित, बेटा…”
ये उसकी माँ की आवाज़ थी। बिल्कुल वैसी ही, जैसे वो उसे घर पर सुबह उठाने के लिए बुलाती थी।
दिल की धड़कन तेज़ हो गई, मगर डर से नहीं — उलझन से। माँ यहाँ कैसे हो सकती है? घर तीन सौ किलोमीटर दूर था। शायद कोई सपना है, उसने खुद को समझाया। फिर फोन का टॉर्च ऑन किया, टेंट का ज़िप हल्के से खोला, बाहर झांककर देखा।
कुछ नहीं था। सिर्फ अंधेरा, और दूर पेड़ों की परछाइयां।
वो वापस लेटने ही वाला था कि फिर आवाज़ आई — इस बार थोड़ी दूर से, जैसे नदी के उस पार से। “अंकित… इधर आना…”
अब उसे यकीन हो गया कि ये सपना नहीं है। दिमाग में एक अजीब सा ख्याल आया — क्या वो सच में यहाँ है, लेकिन ये सोचना भी अटपटा था, क्योंकि उसकी माँ यहां कैसे हो सकती है, वो तो इस वक़्त घर होगी।
मगर उस वक़्त नींद और डर दोनों के बीच दिमाग ठीक से काम नहीं कर रहा था। उसने बाकियों को जगाने की सोची, फिर रुक गया।
“सुमित इतनी गहरी नींद में है, जगाऊंगा तो नाराज़ होगा। दो मिनट में देख के आता हूँ,” उसने मन ही मन सोचा।
जूते पहने, टॉर्च ऑन की, टेंट से बाहर निकल आया। ठंडी हवा चल रही थी, नदी की आवाज़ रात के सन्नाटे में तेज़ लग रही थी।
“माँ?” उसने धीरे से पुकारा।
“यहाँ हूँ, बेटा…” आवाज़ आई — इस बार बाईं तरफ से, जंगल की तरफ से।
वो उस दिशा में बढ़ा, टॉर्च की रोशनी पेड़ों पर घुमाते हुए। कदम धीरे-धीरे तेज़ होते गए। “माँ, आप हो कहाँ?” उसकी आवाज़ में अब हल्की घबराहट थी।
“यहीं तो हूँ…” — अबकी आवाज़ थोड़ी और दूर से आई, जैसे वो जितना आगे बढ़ता, आवाज़ उतनी ही खिसकती जाती। जैसे कोई उसे किसी दिशा में खींच रहा हो, कदम दर कदम।
अंकित को इतना समझ आ गया था कि ये कुछ ठीक नहीं है, मगर पैर रुक नहीं रहे थे। एक अजीब सा खिंचाव था, जैसे शरीर दिमाग की बात नहीं सुन रहा हो।
कैंप अब काफी पीछे छूट चुका था, कैंपफ़ायर की हल्की रोशनी भी नहीं दिख रही थी। टॉर्च की रोशनी में सिर्फ पेड़ ही पेड़ दिख रहे थे, ज़मीन पर सूखे पत्ते, कहीं-कहीं झाड़ियाँ।
“माँ, plz आवाज़ दो, मुझे नहीं दिख रहा आप कहाँ हो,” उसने लगभग रोने की आवाज में गिड़गिड़ाते हुए कहा।
कुछ देर सन्नाटा रहा।
फिर आवाज़ आई — इस बार बहुत पास से, मगर एक अलग दिशा से। बाई तरफ से नहीं, बल्कि…पीछे से।
“अंकित…”
वो वहीं रुक गया, टॉर्च थामे हाथ थोड़ा कांपने लगा। ये आवाज़ ठीक उसी जगह से आ रही थी जहाँ से वो अभी-अभी चलकर आया था।
उसने पीछे मुड़ने के लिए धीरे से गर्दन घुमाई…
Continue…
(पीछे मुड़ने पर अंकित को क्या दिखा? और उस रात कैंप में बाकी दोस्तों के साथ क्या हुआ? भाग 2 में जानिए —) और मेरे पापा जी ने मुझे जो सीख दी थी जो मैं आज तक नहीं भुला वह भी भाग 2 में जानिए)
(भाग 2 पढ़ने के लिए नीचे comment करें भाग 2)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल-जवाब
1. कैंपिंग के लिए सुरक्षित जगह चुनते वक़्त क्या ध्यान रखें?
फॉरेस्ट डिपार्टमेंट से परमिशन वाली, और जानी-पहचानी जगह चुनें और लोकल लोगों की सलाह ज़रूर सुनें।
2. रात में जंगल में फोन का सिग्नल न मिले तो पहले से क्या तैयारी रखनी चाहिए?
पावर बैंक और टॉर्च, अपने साथ रखे, और किसी को अपनी लोकेशन पहले से शेयर करके रखें।
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मै एक लेखक हू, और हर दिन अपनी वेबसाइट kahanighar.in पर रोज नई-नई भूतिया कहानी, चुडैल की कहानी, long horror stories लाता हूं।
उम्मीद है आप मेरी कहानियों को अपने दोस्तों के साथ भी Share करते होंगे, ताकि वो भी इन डरावनी भूतिया कहानी का लुत्फ उठा सके।