Girls Hostel Ki Darawani Kahani Part 3

जैसा कि आपने भाग 1 और भाग 2 में पढ़ा, नैना अब उस तारीख के बेहद करीब थी जिससे वो बचना चाहती थी।

अगर आपने अभी तक Part 1 और Part 2 नहीं पढ़े, तो पहले वहाँ से शुरू करें — वरना कहानी का असली मज़ा और डर कम हो जाएगा।”

Part 1:- Girls Hostel Ki Darawani Kahani Part 1

Part 2:- Girls Hostel Ki Darawani Kahani Part 2


Girls Hostel Ki Darawani Kahani Part 3 👇

नैना ने उस रात तय किया कि वो अब नौ बजे वाली बस में नहीं चढ़ेगी, चाहे कुछ भी हो जाए। ईशिता से भी वादा लिया कि वो साथ रहेगी, हॉस्टल के गेट से बाहर एक कदम नहीं रखेंगी।

पर दिन का प्लान कुछ और ही निकला। कॉलेज में शाम को अचानक एक ज़रूरी सेमिनार लग गया जिसमें हाज़िरी अनिवार्य थी, और सेमिनार खिंचता चला गया। जब खत्म हुआ, घड़ी में आठ बजकर पचास मिनट हो चुके थे।

ईशिता का फोन बंद था, वो हॉस्टल में रह गई थी असाइनमेंट की वजह से। नैना अकेली थी, कॉलेज के मेन गेट से हॉस्टल तक जाने का कोई और रास्ता नहीं था, इस वक्त ऑटो भी नहीं मिल रहे थे। मजबूरन, वो बस स्टॉप की तरफ भागी।

बस पहले से खड़ी थी, इंजन चालू। भगत दा दरवाज़े पर खड़े थे। नैना को देखकर उनके चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी आई।

“आज मत चढ़ो,” उन्होंने धीरे से कहा, लगभग फुसफुसाते हुए, “आज की तारीख ठीक नहीं है।“

“मेरे पास कोई और रास्ता नहीं है,” नैना ने कहा, आवाज़ काँप रही थी, “मुझे हॉस्टल पहुँचना है।“ मै यहाँ रात को अकेले, कॉलेज में नहीं रुक सकती।

भगत दा ने कुछ पल उसे देखा, फिर एक तरफ हट गए, जैसे रोकने की हिम्मत ही न बची हो। नैना बस में चढ़ी। बस लगभग खाली थी — सिर्फ सात लड़कियाँ, सब आगे की सीटों पर सिमटी हुईं, किसी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

पीछे वाली खिड़की सीट खाली थी। नैना जानती थी उसे वहाँ नहीं बैठना, पर पैर खुद-ब-खुद उसी तरफ बढ़ गए, जैसे कोई और उसे अपनी तरफ खींच रहा हो।

भगत दा फोन पर बातों में व्यस्त हो गए, उन्होंने भी ध्यान नहीं दिया।

बस चली। कुछ मिनट सब सामान्य लगा। फिर उसने महसूस किया कि उसकी बगल की सीट, जो अभी तक खाली थी, अब खाली नहीं रही। उसने बगल में देखने की हिम्मत नहीं की। नैना की खिड़की का शीशा धुंधला होने लगा, भाप जमने लगी, अंदर से नहीं बाहर से — जैसे कोई अपनी साँसों से उसे धुंधला कर रहा हो।

“मुझे घर जाना है,” एक आवाज़ आई, बहुत पास से, बहुत धीमी, “पापा बीमार हैं।“

नैना ने आँखें बंद कर लीं, अपने हाथ मुट्ठी में भींच लिए। ये मेहर है, मुझे कुछ नहीं होगा।

बस मोड़ के पास पहुँची — वही मोड़ जहाँ तीन साल पहले हादसा हुआ था। ड्राइवर ने अचानक ब्रेक लगाई, बहुत ज़ोर से, बस लहराई, हॉर्न बजा, आगे कोई गाड़ी नहीं थी सड़क पर, फिर भी ड्राइवर चिल्लाया जैसे कुछ सामने आ गया हो एक पल के लिए। बस किनारे जाकर रुक गई।

अफरातफरी में सब लड़कियाँ उतर गईं, डर के मारे रोती हुईं। भगत दा गिनती करने लगे, एक-एक करके। उन्होंने गिना, कुल आठ टिकट कटे थे, और सात लड़कियाँ ही नीचे खड़ी थीं।

पीछे वाली सीट खाली थी। नैना का बैग वहीं पड़ा था, उसका फोन सीट पर, स्क्रीन पर आखिरी मैसेज ईशिता को आधा टाइप किया हुआ — “मैं बस में हूँ, पहुँचते ही बताती हूँ, आज बहुत डर लग रहा है, ऐसा लग रहा है जैसे—“

आगे कुछ नहीं लिखा था।

अगले दिन कॉलेज में हड़कंप मच गया। पुलिस आई, तलाशी हुई, सड़क किनारे, आसपास के खेतों में, कहीं कुछ नहीं मिला। भगत दा से पूछताछ हुई, बाकी लड़कियों से भी, पर किसी ने कुछ साफ नहीं बताया — सब बस इतना कहती रहीं कि अचानक ब्रेक लगी, अफरातफरी हुई, और उतरने के बाद पता चला नैना नहीं है। किसी को याद नहीं वो कब गायब हुई।

हफ्तों तक खोज चलती रही, फिर धीरे-धीरे केस “अनसुलझा” फाइलों में चला गया, जैसे कितने ही और केस चले जाते हैं। ईशिता ने बहुत कोशिश की, वार्डन से लड़ी, पुलिस स्टेशन के चक्कर काटे, पर जवाब हमेशा वही मिला — “कोशिश जारी है, कुछ पता चलते ही बताएंगे।“

एक साल हो गया, हॉस्टल के रजिस्टर में उस साल की एंट्री आज भी वैसी ही पड़ी है जैसी मेहर थापा की थी — एक लाइन और जुड़ गई थी, लाल स्याही में।

“नैना रावत। दुर्घटना। 14 अक्टूबर।“

एक साल बाद 

अगले साल जब नई लड़कियाँ हॉस्टल में आईं, उनको नौ बजे वाली बस में खिड़की सीट के बारे में नियम बता दिया गया — कि वहाँ कभी मत बैठना। किसी ने पूछा क्यों, तो सीनियर ने बस इतना कहा, “बस मत बैठना, समझ लो।“

ईशिता का कॉलेज पूरा हो गया, पर वो आज भी पुलिश स्टेशन और कॉलेज के चक्कर काट रही है। 

और भगत दा आज भी, हर 14 अक्टूबर की रात, आखिरी सीट पर एक नज़र ज़रूर डालते हैं, कहीं कोई लड़की गलती से बैठ तो नहीं गई है।

—समाप्त—


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल-जवाब ( FAQs )

1. गर्ल्स हॉस्टल में लड़कियों के गायब होने के केस असल ज़िंदगी में भी होते हैं क्या?

दुर्भाग्य से हाँ, कई बार हॉस्टल या पीजी से लड़कियों के लापता होने के मामले सामने आते हैं, और कई केस सालों तक अनसुलझे रह जाते हैं।

2. क्या हॉस्टल की पुरानी बिल्डिंग्स या कमरों में ऐसी कहानियाँ सच में सुनने को मिलती हैं?

हाँ, लगभग हर पुराने हॉस्टल में कोई न कोई ऐसा किस्सा ज़रूर मिल जाएगा जो सीनियर्स से जूनियर्स तक पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहता है — कुछ अफवाह होते हैं, कुछ अनसुलझे रहस्य।

3. क्या रात में सुनसान रास्तों पर चलने वाली बसों में सच में कुछ अजीब घटनाएं होती हैं?

बहुत से लोग सुनसान और अंधेरे रास्तों पर अकेले सफर करते वक्त अजीब सन्नाटे या बेचैनी का अनुभव बताते हैं, हालांकि इसे ज़्यादातर मनोवैज्ञानिक कारणों से जोड़ा जाता है — पर हर कोई इस तर्क से सहमत नहीं होता।

4. क्या हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों के लिए कोई सुरक्षा डिवाइस या ऐप काम का साबित होता है?

जी हाँ, पैनिक बटन वाली सेफ्टी ऐप्स और लोकेशन-ट्रैकिंग डिवाइस आजकल काफी मददगार साबित होते हैं, खासकर देर रात अकेले सफर के दौरान।


तो दोस्तों, कैसी लगी आपको हमारी ये “Girls Hostel Ki Darawani Kahani” सीरीज़? कमेंट में ज़रूर बताइए

अगर आपको ऐसी ही हॉरर सीरीज़ पढ़ना पसंद है, तो नीचे दी गई Episodic Horror Stories भी ज़रूर पढ़ें। 👇

√ रात 2 बजे जंगल में आई माँ की आवाज़ | भूतिया कहानी

√ वो लौट आई: रम्मो चुडैल की कहानी | Chudail Horror Story

√ Top 5 Chudail Ki Kahani: रूह कंपा देने वाली 5 सबसे डरावनी चुडैल की कहानियाँ

अगर ये कहानी आपको पसंद आई हो, तो इसे ज़्यादा से ज़्यादा शेयर करें — ताकि ये किसी और के भी काम आए।

💖 कहानी पसंद आई? तो Like करके अपने दोस्तों तक जरूर पहुँचाएँ 👇

Leave a Comment