Girls Hostel Ki Darawani Kahani Part 2 में नैना को पिछली रात बस में दिखी रहस्यमयी लड़की का सच जानने की बेचैनी थी। हॉस्टल के पुराने रजिस्टर में उसे एक ऐसा नाम मिला, जिसने उसके होश उड़ा दिए—मेहर थापा।
अगर आपने अभी तक Girls Hostel की इस कहानी का part 1 नहीं पढ़ा है, तो पहले आप Part 1 जरूर पढ़ें। ताकि कहानी पढ़ने में मजा पूरा आए। इसलिए पहले Part 1 जरूर पढ़ें
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Girls Hostel Ki Darawani Kahani Part 2 👇
कहानी की शुरुआत
नैना पूरे दिन क्लास में बैठी रही, पर भगत दा की बात उसके दिमाग से नहीं निकली। “तुम उस बस में नहीं थी” — ये बात मज़ाक जैसी नहीं लग रही थी।
उसकी आवाज़ में वो यकीन था, जो झूठ बोलने वाले की आवाज़ में नहीं होता।
शाम को वो लाइब्रेरी नहीं गई, सीधे हॉस्टल के रजिस्टर रूम पहुँच गई, जहाँ वार्डन साहिबा हर लड़की की आवाजाही की एंट्री रखती थीं — कौन कब हॉस्टल से निकला, कौन कब वापस आया।
उसने बहाना बनाया कि उसे अपने कल के आने-जाने का टाइम चेक करना है किसी असाइनमेंट के लिए।
रजिस्टर में कल की तारीख के सामने उसका नाम था — “नैना रावत, आउट: 6:45 PM, इन: 9:20 PM।“ उसकी अपनी हैंडराइटिंग में साइन भी थे। मतलब वो हॉस्टल से गई भी थी और वापस भी आई थी। तो भगत दा गलत क्यों बोल रहा था?
उसने रजिस्टर के पुराने पन्ने यूँ ही पलटने शुरू किए, बिना किसी खास मकसद के, कुछ पन्ने पीछे जाते-जाते, अचानक एक नाम पर उसकी नज़र अटक गई।
“मेहर थापा।“
नाम के आगे कोई आउट-इन एंट्री नहीं थी, बस एक लाल स्याही में लिखा हुआ शब्द — “दुर्घटना। 14 अक्टूबर।“
नैना का दिल एक पल के लिए रुक सा गया। आज की तारीख देखी उसने — 12 अक्टूबर। दो दिन बाद, 14 तारीख, वही तारीख फिर आने वाली थी।
उसने रजिस्टर बंद कर दिया और सीधे ईशिता के पास गई, इस बार बहाने की गुंजाइश नहीं छोड़ी।
“मुझे मेहर थापा के बारे में बताना होगा। अभी।“
ईशिता ने लंबी साँस ली, दरवाज़ा बंद किया, और बैठ गई। “मेहर हमसे दो बैच सीनियर थी। बहुत अच्छी लड़की थी, सबकी चहेती।
तीन साल पहले, 14 अक्टूबर की रात, वो नौ बजे वाली बस में घर जा रही थी — उसके पापा की तबीयत खराब थी, वो इमरजेंसी में निकली थी।
बस मोड़ पर एक ट्रक से टकरा गई। सिर्फ वही सीट डायरेक्ट हिट में आई थी जहाँ वो बैठी थी। बाकी सब बच गए।“ और वो मर गई।
“और उसके बाद?”
“उसके बाद से, हर साल, कुछ लड़कियाँ बताती हैं कि नौ बजे वाली बस में एक लड़की दिखती है। ज़्यादातर लोग इसे अफवाह समझते हैं। पर हॉस्टल में एक अनकहा नियम बन गया है — कोई उस पीछे वाली खिड़की सीट पर नहीं बैठता। कभी नहीं।“
नैना ने अपनी बात बताई — भगत दा वाली। ईशिता का चेहरा और गंभीर हो गया।
“ये पहली बार है, भगत दा हर लड़की को पहचानते हैं, वो गलती नहीं करते।“
उस रात नैना ठीक से सो नहीं पाई। नींद टूटी तो उसने अपनी डायरी उठाई, कुछ लिखकर मन हल्का करने के लिए। पन्ने पलटते हुए उसे एक एंट्री दिखी जो उसने कभी नहीं लिखी थी — उसी की हैंडराइटिंग में।
“कल रात मैं फिर बस में थी। कोई मुझे देखता नहीं। मुझे घर जाना है, मेरे पापा बीमार हैं।
नैना ने डायरी बंद कर दी, हाथ काँप रहे थे। उसने ईशिता को जगाया, पन्ना दिखाया। ईशिता ने पढ़ा तो पीली पड़ गई।
“मेरे पापा बीमार है।“ “ये मेहर के आखिरी शब्द थे,” उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “ये उसकी डायरी में लिखा मिला था, एक्सीडेंट वाली रात से पहले का। ये किसी को पता नहीं होना चाहिए, ये सिर्फ वार्डन ने बताया था मुझे, प्राइवेट में।“
अगले दिन नैना ने पुरानी हॉस्टल फ़ाइलें देखने की कोशिश की, ये समझने के लिए कि मेहर के साथ आखिर हुआ क्या था असल में।
वार्डन के ऑफिस के बाहर एक पुरानी अलमारी में तीन साल पुराने एडमिशन रजिस्टर पड़े थे। साफ सफाई करने वाली मौसी की नज़र से बचकर उसने एक पुराना रजिस्टर निकाला — जिस साल मेहर हॉस्टल में एडमिट हुई थी।
तभी बाहर से किसी ने आवाज लगाई। वार्डन साहिबा की आवाज़ थी। नैना ने जल्दी से रजिस्टर बंद करके रख दिया, और छुपकर बाहर निकल गई।
दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। बाहर निकलते हुए उसने कैलेंडर पर नज़र डाली — आज 13 अक्टूबर था। कल 14 तारीख होने वाली थी।
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14 अक्टूबर की तारीख अब सिर्फ एक दिन दूर थी, और नैना को अब भी नहीं पता था कि इससे बचने का कोई रास्ता है भी या नहीं। क्या होगा जब वो तारीख आएगी —
जानिए भाग 3 में, इस कहानी के अंत में।
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Part 3:- Girls Hostel Ki Darawani Kahani Part 3
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