अमावस की रात दरवाजे पर दस्तक | Hindi Horror Story

“तीन साल बाद बेटा लौटा, पर हर रात अंधेरे में चुपचाप खड़ा मिलता। एक रात माँ को पता चला, जो उसके साथ सो रहा था… वो इंसान नहीं था।”

रोंगटे खड़े कर देने वाली Hindi Horror Story।


कहानी की शुरुआत – Hindi Horror Story

लोग कहते हैं कि माँ अपने बच्चे की आहट नींद में भी पहचान जाती है। मैं भी यही मानती थी। तब तक, की जब तक उस अमावस की रात मेरे दरवाज़े पर वो दस्तक नहीं हुई।

मेरा नाम सावित्री है। रामपुर गाँव में, नहर के किनारे वाला कच्चा-पक्का मकान मेरा है। पति को गुज़रे आठ बरस हो गए। एक ही बेटा था मेरा, मोहन। तीन साल पहले, जब वो चौदह बरस का था, एक शाम गाँव के पीछे वाले पुराने बाग़ में आम बीनने गया और लौटा नहीं।

तीन साल। मैंने क्या नहीं किया। थाने की चौखट घिस दी। पंडित, मौलवी, ओझा, जिसने जो बताया वही किया। नदी में जाल डलवाए, कुएँ-तालाब खंगलवाए। बाग़ के आगे वाले सूखे कुएँ में भी रस्सी उतारी गई थी, पर वहाँ सिर्फ़ अँधेरा और सड़ी हुई बदबू मिली। मोहन की एक चप्पल बाग़ में पड़ी मिली थी, बस वही। वो चप्पल आज भी मेरे सिरहाने रखी रहती है।

धीरे-धीरे गाँव ने मान लिया कि लड़का नहीं रहा। पर मैंने नहीं माना। रोज़ शाम दीया जलाकर देहरी पर रखती और कहती, “आ जाना बेटा, अम्मा जाग रही है।“

वो रात

अमावस की रात दरवाजे पर दस्तक | Hindi Horror Story - देहरी पर खड़ा साया: यह 2D हॉरर आर्टवर्क अमावस की घनी अंधेरी रात में एक पुराने भारतीय घर के दरवाजे का है, जहां एक रहस्यमयी और डरावनी परछाईं जैसा लड़का दस्तक दे रहा है, जिससे कहानी का तनावपूर्ण माहौल झलकता है।

कार्तिक की अमावस थी। ऐसी अँधेरी रात कि अपना हाथ भी न दिखे। कुत्ते सुबह से ही अजीब तरह से रो रहे थे, और हमारा मोती, जो कभी किसी अजनबी से नहीं डरता था, दोपहर से ही चारपाई के नीचे घुसकर बैठा काँप रहा था।

रात के कोई बारह-एक बजे होंगे। मैं लेटी थी, नींद नहीं आ रही थी। तभी दरवाज़े पर धीरे से खटखट हुई। तीन बार। ठीक वैसे ही जैसे मोहन खटखटाता था, पहले एक, फिर रुककर दो।

मेरा कलेजा मुँह को आ गया। मैं नंगे पैर दौड़ी। कुंडी खोलने से पहले बाहर से आवाज़ आई,

“माँ… दरवाज़ा खोलो। मैं हूँ।“

आवाज़ मोहन की थी। थोड़ी भारी, थोड़ी बदली हुई, तीन साल में लड़के की आवाज़ बदल ही जाती है। मैंने काँपते हाथों से किवाड़ खोल दिया।

सामने वही खड़ा था। मेरा मोहन। लंबा हो गया था, दुबला-पतला, बाल बढ़े हुए, कपड़े मैले और फटे। उसकी आँखें मुझ पर टिकी थीं।

मैंने उसे सीने से लगा लिया। उस रात मैं इतना रोई कि गला बैठ गया। वो चुपचाप खड़ा रहा। उसके बदन से मिट्टी और सीलन की बू आ रही थी, और बदन बर्फ़ की तरह ठंडा था। मैंने सोचा, बेचारा कब से भटक रहा है, ठंड लग गई होगी। 

मैंने उसे बिठाया, पानी दिया, गरम रोटी सेंकी। उसने पानी का गिलास हाथ में लिया, पर पिया नहीं। रोटी सामने रखी रही।

“खा ले बेटा,”

वो मुस्कुराया। बहुत धीरे “अभी भूख नहीं है, माँ।“

माँ। वो तो हमेशा मुझे “अम्मा” कहता था। पर मैंने सोचा, इतने साल बाहर रहा, शहर की बोली सीख आया होगा। उस रात मैंने हर खटकने वाली बात को ममता के नीचे दबा दिया। कौन माँ अपने लौटे हुए बेटे में खोट ढूँढती है?

पहले तीन दिन

सुबह पूरा गाँव उमड़ आया। “अरे सावित्री का मोहन लौट आया!” औरतें रो रही थीं, आदमी कंधे थपथपा रहे थे। सरपंच ने पूछा, “कहाँ था बेटा इतने दिन?”

मोहन कुछ देर उसकी आँखों में देखता रहा और बोला, “याद नहीं, काका। बस इतना याद है कि वहाँ बहुत अँधेरा था।“

सब पसीज गए। किसी ने कहा सदमा है, किसी ने कहा किसी ने उठा लिया होगा। बात वहीं ख़त्म हो गई। पर मैंने ग़ौर किया कि जितनी देर वो सबके सामने खड़ा रहा, उसने पलक एक बार भी नहीं झपकाई।

पहले मैने इसे इग्नोर कर दिया। पर उस दिन दोपहर मैं आँगन में बैठी अनाज फटक रही थी। मोहन सामने चारपाई पर बैठा था। मैंने पूरे पंद्रह मिनट उसे देखा। उसकी न पलक गिरी, न आँख की पुतली हिली। बस एकटक मुझे ताकता रहा, जैसे आंखों में शीशे की गोलियाँ जड़ दी गई हों। और जब मैंने नज़र मिलाई तो उसने वही धीमी मुस्कान दे दी।

मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। मैंने खुद को डाँटा, “पगली, लड़का सदमे में है, और तू उसे भूत बनाने पर तुली है।“

पहली ही रात सोने से पहले मैंने उसे अपने बगल वाली कोठरी में बिस्तर लगा दिया, जो तीन साल से उसकी राह देख रही थी। वो चुपचाप लेट गया। मैं भी सो गई।

रात में किसी वजह से मेरी आँख खुली। घर में सन्नाटा था। पर एक अजीब सा एहसास हुआ, जैसे कोई मुझे देख रहा हो। मैंने आँखें खोलीं तो मेरी चारपाई के पैताने, ठीक अँधेरे में, कोई खड़ा था।

मोहन।

सीधा, बिना हिले, हाथ नीचे लटकाए। उसकी आँखें खुली थीं और उनमें रत्ती भर नींद नहीं थी। मैंने डरकर पूछा, “क्या हुआ बेटा? नींद नहीं आ रही?”

वो कुछ देर तक चुप रहा, फिर बोला, “आपको देख रहा था, माँ। आप सोते हुए बहुत अच्छी लगती हैं।“

और वापस अपनी कोठरी में चला गया। उसके क़दमों की आहट नहीं आई।

मैं सुबह तक नहीं सोई।

जो चीज़ें ठीक नहीं थीं

एक हफ़्ते में मैंने एक-एक करके वो सारी बातें गिन लीं, जिन्हें मैं रोज़ अनदेखा करती आ रही थी।

मोहन बचपन से बाएँ हाथ से लिखता-खाता था। इतना कि मास्टर जी उसे सुधारने के लिए रोज़ डाँटते थे। पर लौटा हुआ मोहन हर चीज़ दाएँ हाथ से करता था। मैंने एक दिन जान-बूझकर पानी का लोटा उसके बाएँ तरफ़ रखा। उसने अटपटे ढंग से हाथ बढ़ाया, फिर रुककर लोटा दाईं तरफ़ खिसकाया और पिया।

उसके दाहिने घुटने पर चोट का पुराना निशान था। सात साल की उम्र में साइकिल से गिरा था। एक दिन जब वो नहा रहा था, मैंने दरवाज़े की दरार से देखा। घुटना एकदम साफ़ था। जैसे वहाँ कभी कोई चोट लगी ही न हो।

वो खाना नहीं खाता था। सिर्फ़ रात को जब मैं सो जाती तो आँगन में उसके कुछ चबाने की आवाज आती। एक सुबह मैंने देखा, कच्चे बैंगन और आलू के छिलके यहाँ-वहाँ बिखरे थे, जिन पर दाँतों के निशान थे, मैने सोचा इतने सालों बाद आया है इसलिए शर्मा रहा है, इसलिए मुझ से छुपकर खाना खाता है। मै मन ही मन मुस्कुरा दी। 

मोती अब घर में नहीं था। जिस दिन से मोहन आया, कुत्ता जो चारपाई के नीचे घुसा बैठा था, वो चौथे दिन भागकर गाँव के बाहर चला गया, फिर कभी लौटा ही नहीं।

और वो बातें जो सबसे ज़्यादा मेरी नींद खा गईं। रात को जब भी मेरी आँख खुलती, वो घर के किसी न किसी कमरे में खड़ा मिलता। कभी रसोई में, दीवार की तरफ़ मुँह किए। कभी आँगन के बीच, आसमान की ओर सिर उठाए। कभी मेरे सिरहाने। और हर बार जब मैं उसे पुकारती, वो बिना मुड़े जवाब देता, “सो जाइए, माँ। मैं यहीं हूँ।“

एक रात मैंने हिम्मत करके पूछा, “मोहन, तू रात को सोता क्यों नहीं?”

वो देर तक चुप रहा, फिर बहुत धीमे बोला, “जहाँ से आया हूँ, वहाँ सोने नहीं देते थे।“

मैंने पूछा, “कहाँ से आया है तू?”

उसने अपना सिर उठाया और मेरी ओर देखा। अँधेरे में उसकी आँखें बिल्कुल स्थिर थीं। 

“मै डर गई” 

बूढ़ी काकी की बात

अगले दिन मैं पड़ोस की बूढ़ी काकी के पास गई। काकी नब्बे से ऊपर की थीं, गाँव की हर पुरानी बात उनकी जुबान पर रहती थी। मैंने रोते हुए सब कह डाला।

काकी ने पूरी बात सुनी। फिर बहुत देर तक चुप रहीं। फिर पूछा, “बिटिया, लड़का किस दिन लौटा था?”

“अमावस की रात। कार्तिक अमावस।“

काकी का चेहरा पीला पड़ गया। “और कहाँ गायब हुआ था? पीछे वाले बाग़ से?”

“हाँ काकी।“

“आम के बाग़ के आगे वाला सूखा कुआँ… तुमने उसमें उतर के देखा था?”

“रस्सी उतारी थी, काकी। कुछ नहीं मिला।“

काकी ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनके हाथ काँप रहे थे। “सावित्री, वो कुआँ मेरे बाप-दादा के भी बाप-दादा के ज़माने का है। उसमें कोई पानी नहीं, कोई तल नहीं। हमारे बुज़ुर्ग कहते थे कि उस कुएँ में ‘कोई’ रहता है। हर कुछ बरस में वो किसी बच्चे को नीचे खींच लेता है। और तीन बरस बाद, ठीक अमावस को, उस बच्चे की शक्ल लेकर लौट आता है।“

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

“वो लौटता है, क्योंकि उसे घर चाहिए। माँ की कोख की गर्मी चाहिए। वो धीरे-धीरे उस औरत की हड्डियां चूसता है, जब तक कि…” काकी ने बात अधूरी छोड़ दी।

“जब तक क्या, काकी?”

“जब तक की वो पूरी तरह खाली ना हो जाए।“ फिर वो किसी और घर चला जाता है।“

मैंने रोते हुए पूछा, “तो मेरा मोहन? मेरा असली मोहन कहाँ है?”

काकी की आँखें भर आईं। “पता नहीं, बिटिया। मेरी दादी कहती थीं कि असली बच्चा उसी कुएँ के अँधेरे में क़ैद रहता है। इतना नीचे की कोई आम इंसान वहां तक नहीं पहुँच सकता। और अगर असली को वापस लाना है…”

“तो?”

काकी ने मेरे कान के पास मुँह लाकर बहुत धीमे कहा, “तो उसे अपने घर से निकालना पड़ेगा। पर वो जाएगा नहीं, जब तक तू उसे ‘ना’ नहीं कहती। वो सिर्फ़ तब तक तेरे घर में है, जब तक तू उसे मन से अपना बेटा माने।

जिस दिन तू उसे नक़ली कहकर पुकारेगी, पूरी ताक़त से, उसका असली रूप सामने आ जाएगा। पर बेटी… उस रूप को देखने के बाद पता नहीं तेरे साथ क्या हो जाए“

उस रात की कहानी 

अमावस की रात दरवाजे पर दस्तक | Hindi Horror Story - डरी हुई माँ और नक़ली बेटा: इस सिनेमैटिक हॉरर दृश्य में एक वृद्ध भारतीय महिला हाथ में चाकू लिए घर की चौखट पर खड़ी है, जबकि बाहर आंगन में एक दुबला-पतला लड़का अपनी गर्दन को भयानक रूप से टेढ़ा करके उसे घूर रहा है।

घर लौटकर मैंने सारे दरवाज़े बंद किए। रसोई से लोहे का चाकू निकाला, देहरी पर सरसों और नमक की लकीर खींची, और हनुमान चालीसा हाथ में लेकर बैठ गई।

रात गहराई। मोहन अपनी कोठरी से निकला। हमेशा की तरह चुपचाप, बिना आहट के। वो आँगन के बीचोबीच खड़ा हो गया और आसमान की तरफ़ देखने लगा। फिर धीरे से मेरी तरफ़ मुड़ा।

उसकी नज़र मेरे हाथ के चाकू पर गई, फिर सरसों की लकीर पर। और उसकी मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

“आपको पता चल गया, माँ।“

मेरी आवाज़ गले में अटक गई।

“आप डर गईं?” उसने सिर टेढ़ा किया। उसकी गर्दन ऐसे मुड़ी कि कोई इंसान की गर्दन नहीं मुड़ सकती। “मैं तो आपका बेटा हूँ। तीन साल बाद लौटा हूँ। आप मुझे घर से निकालेंगी?”

मैंने पूरी ताक़त बटोरी और चिल्लाई, “तू मेरा बेटा नहीं है! मेरा मोहन ‘अम्मा’ कहता था, ‘माँ’ नहीं! मेरा मोहन बाएँ हाथ से लिखता था! तू कोई और है! निकल जा मेरे घर से!”

पल भर को पूरा आँगन शांत हो गया। और फिर उसका चेहरा बदलने लगा।

आँखें बड़ी होती गईं, इतनी कि पलकें फट गईं, और उनकी जगह दो काले गड्ढे रह गए, जिनमें सफ़ेद पुतलियाँ तैरती हुई दिख रही थीं। उसका मुँह खुलता गया, गाल के दोनों तरफ़ तक। उसके बदन से सीलन और सड़े हुए पानी की वो बदबू फूट पड़ी जो मैंने कुएँ पर सूँघी थी। उसकी उँगलियाँ लंबी होती गईं, और उनके नाखून मिट्टी से भरे थे।

और उसकी आवाज़, वही आवाज़ नहीं थी। ऐसा लगा जैसे सौ लोग एक साथ बोल रहे हों, गहरे कुएँ के भीतर से।

“तीन बरस से… मैं इसी दिन का इंतज़ार कर रहा था… इतना अच्छा घर… इतनी गरम कोख… मुझे और रहना है… यहाँ” 

वो मेरी ओर बढ़ा। मेरी हड्डिया चूसने के लिए। उसके पैर ज़मीन पर चल नहीं रहे थे, बस घिसट रहे थे। मैंने चाकू सामने किया, हनुमान चालीसा ज़ोर-ज़ोर से पढ़नी शुरू की। मेरी आवाज़ काँप रही थी, पर मैं रुकी नहीं।

जैसे ही सरसों की लकीर के क़रीब पहुँचा, वो रुक गया, जैसे किसी अदृश्य दीवार से टकराया हो। वो गुर्राया, और उसका चेहरा इतना भयानक हो गया कि मैं बयान नहीं कर सकती।

“तू मुझे निकाल नहीं सकती…”

तभी, कहीं दूर से, बहुत धीमी, बहुत टूटी हुई एक आवाज़ आई।

“अम्मा…”

मेरे पैर जम गए। ये आवाज़ बाहर से आ रही थी, दरवाज़े के उस पार से।

“अम्मा… दरवाज़ा खोलो… मैं हूँ… मोहन…”

और साथ ही तीन बार दस्तक हुई। पहले एक, फिर रुककर दो।

मेरे सामने खड़ा वो जीव पहली बार हँसा। उसकी वो हँसी मेरी हड्डियों में उतर गई।

“खोल दे, माँ… खोल दे… देख कौन आया है…”

मैं पत्थर हो गई। दरवाज़े के बाहर से वही आवाज़, “अम्मा” कहती हुई, रोते हुए, गिड़गिड़ाते हुए। और अंदर वो जीव, जो कह रहा था, “वो मैं नहीं हूँ, माँ… वो नक़ली है… दरवाज़ा मत खोलना…”

दोनों तरफ़ से मेरे बेटे की आवाज़।

मेरा सिर घूमने लगा। कौन सच्चा है? कौन झूठा?

तभी उसे याद आई। वो ‘माँ’ कहता है, ‘अम्मा’ नहीं। जो चीज़ मेरे सामने खड़ी थी, वो बार-बार मुझे “माँ” कह रही थी। और बाहर से आती आवाज़ ने पहली बार में ही “अम्मा” कहा था, वही शब्द जो सिर्फ़ मेरे मोहन के मुँह से निकलता था।

पर अगर ये भी उसी की चाल हुई तो?

बाहर से आवाज़ फिर आई, बहुत कमज़ोर, “अम्मा… मुझे बहुत ठंड लग रही है… तुम्हारी लोरी सुननी है…”

मेरे गले से आँसू फूट पड़े। मेरे पास कोई सबूत नहीं था। सिर्फ़ एक माँ का दिल था, जो कभी किसी दलील से नहीं चलता।

मैंने चाकू फेंक दिया, लोरी गुनगुनाने लगी। वही लोरी जो मैं मोहन को सुलाने के लिए गाती थी- “चंदा मामा दूर के…” मेरी आवाज़ टूटती रही, और बाहर से एक बहुत धीमी सी आवाज़ मेरे साथ-साथ गुनगुनाने लगी। हर उस जगह पर ठीक वैसे ही अटकती हुई, जहाँ मोहन बचपन में अटकता था।

अंदर खड़ा जीव चिल्लाया। मैंने उसकी ओर देखा तक नहीं, और लपककर किवाड़ खोल दिया।

दरवाज़े के उस पार

बाहर मोहन खड़ा था। मेरा असली मोहन।

इतना कमज़ोर कि खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। हड्डियाँ निकली हुई, आँखें धँसी हुई, पूरा बदन मिट्टी और कीचड़ में सना। उसके दाहिने घुटने पर पुराना चोट का निशान साफ़ दिख रहा था। वो मेरी बाँहों में गिर पड़ा।

“अम्मा…”

तभी मेरे पीछे से एक भयानक चीख़ गूँजी, ऐसी चीख़ जिसे सुनकर पूरा गाँव जाग गया। मैंने पलटकर देखा, आँगन में खड़ा वो जीव गोल-गोल घूम रहा था, चीख़ते हुए, और धीरे-धीरे उसका शरीर काली राख में बदलकर हवा में घुलता चला गया। पीछे सिर्फ़ सीलन की वो बदबू रह गई, और सरसों की लकीर के पास मिट्टी में गीले पंजों के निशान।

सुबह हुई 

सुबह होते-होते पूरा गाँव मेरे आँगन में जमा था। सब असली मोहन को देख रहे थे और मुझे। कोई कुछ बोल नहीं पा रहा था।

और फिर…

मोहन को ठीक होने में महीनों लगे। शरीर का घाव भी भर गया। 

एक रात, जब वो थोड़ा ठीक हो चुका था, मैं उसके सिरहाने बैठी थी। मैंने पूछा, “बेटा, तीन साल तू कहाँ था? उस कुएँ में तुझ पर क्या बीती?” और तू बाहर कैसे आया?”

उसने बहुत देर तक छत को देखा। फिर धीमे से बोला, “अम्मा, वो कुआँ बहुत गहरा है। वहाँ नीचे एक पूरी दुनिया है, अँधेरी दुनिया। वहाँ मुझ जैसे और भी बच्चे हैं। बहुत सारे। कोई दस साल से, कोई बीस साल से।“

मेरी साँस रुक गई।

मोहन की आवाज़ धीमी होती गई। “और हर बार जब कोई ऊपर से नया बच्चा नीचे आता है, तो कोई… उसकी शक्ल लेकर ऊपर चला जाता है।“

उसने मेरी ओर देखा। उसकी आँखों में डर था,।

“अम्मा, वो अकेला नहीं था। जो तुम्हारे घर आया, वो तो बस पहला था। उन सबको बहुत भूख लगी है, और बहुत सारे घर चाहिए।“

उसी पल, बहुत दूर, गाँव के किसी दूसरे छोर से, एक कुत्ता रोने लगा।

फिर एक और।

फिर पूरे गाँव के कुत्ते एक साथ रोने लगे।

मैंने खिड़की से बाहर देखा। आसमान में चाँद नहीं था। अमावस की रात फिर आने वाली थी।

और बहुत दूर, किसी के घर के दरवाज़े पर, धीरे से एक दस्तक हुई।

ठक…ठक…ठक…

“माँ… दरवाज़ा खोलो… मैं हूँ…”

—समाप्त—


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