Girls Hostel Ki Darawani Kahani Part 1

अगर आपको हॉस्टल की बंद गलियों, सुनसान रातों और अनजाने रहस्यों से जुड़ी डरावनी कहानियाँ पसंद हैं, तो Girls Hostel Ki Darawani Kahani Part 1 आपको आखिरी लाइन तक पढ़ने पर मजबूर कर सकती है।

आखिर उस बस में उसके साथ कौन था? पढ़िए पूरी कहानी…

Girls Hostel Ki Darawani Kahani – Part 1 👇


कहानी की शुरुआत

नैना को हॉस्टल आए अभी दो हफ़्ते ही हुए थे, और अब तक उसे बस एक ही चीज़ समझ आई थी — यहाँ हर चीज़ का एक टाइम होता है।

सुबह की चाय सात बजे, मेस का खाना साढ़े आठ पर बंद, और रात की आखिरी बस ठीक नौ बजे कॉलेज गेट से चलती है। कोई पाँच मिनट लेट हो जाए तो बस नहीं रुकती। ये बात उसे उसकी रूममेट ईशिता ने पहले ही दिन बता दी थी।

“नौ बजे वाली बस मिस मत करना कभी,” ईशिता ने कहा था, “अगली बस साढ़े ग्यारह बजे है, और उतनी देर गेट के बाहर अकेले खड़े रहना ठीक नहीं।“

नैना को ये बात एक सामान्य हॉस्टल-सीनियर वाली नसीहत लगी थी। कॉलेज शहर से थोड़ा बाहर था, सड़क सुनसान थी, बस का लेट होना या रुक जाना किसी को भी परेशान कर सकता था। इसमें कुछ अजीब नहीं था।

उस दिन लाइब्रेरी में प्रोजेक्ट का काम खिंच गया, और नैना ठीक नौ बजे, आखिरी मिनट में भागते हुए बस में चढ़ी। बस लगभग भरी हुई थी — कुछ लड़कियाँ फोन में लगी थीं, कुछ आपस में बातें कर रही थीं, कंडक्टर टिकट काट रहा था अपनी सीट से बिना हिले। नैना को बैठने की जगह ढूंढनी थी, और पीछे की तरफ खिड़की वाली एक सीट खाली दिखी।

वो वहाँ जाकर बैठ गई। सीट पर बैठते ही उसे एहसास हुआ कि बगल वाली सीट खाली नहीं है — उस पर एक लड़की बैठी थी, खिड़की से बाहर देखती हुई। पुराना, थोड़ा भूरा हो चुका कॉलेज यूनिफॉर्म, बाल दो चोटियों में बंधे, हाथ में एक पुरानी नोटबुक।

नैना ने उसकी तरफ देखा, हल्का सा सिर हिलाया, लेकिन लड़की की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। लड़की खिड़की से बाहर ही देखती रही, जैसे बस में कोई और मौजूद हो या ना हो उसे कोई फर्क नही पड़ता।

पंद्रह मिनट का रास्ता था। नैना ने अपना फोन निकाला, फिर बोर होकर वापस उस लड़की की तरफ देखा। “एक्सक्यूज़ मी, आप फर्स्ट ईयर में हो?”

कोई जवाब नहीं। लड़की की पलकें तक नहीं झपकीं।

नैना को थोड़ा अटपटा लगा, पर उसने सोचा शायद मूड खराब हो। उसने खिड़की से बाहर देखा — रात का अंधेरा, सड़क किनारे पेड़ों की परछाइयाँ पीछे भागती हुईं।

तभी उसने गौर किया कि उसकी अपनी खिड़की पर हल्की भाप जमी हुई थी, जैसे ठंड में शीशा धुंधला जाता है। पर बस में AC नहीं था, और बाहर मौसम खास ठंडा भी नहीं था। उसने बगल में देखा — उस लड़की की तरफ की खिड़की बिल्कुल साफ थी। कोई भाप नहीं।

उसने इसे नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की।

दो स्टॉप बाद बस थोड़ी खाली हुई। कुछ लड़कियाँ उतर गईं। नैना ने सोचा अब आगे की सीट पर शिफ्ट हो जाए, पर तभी उसकी नज़र सामने वाली सीट पर बैठी एक लड़की पर पड़ी जो उसे घूर रही थी — नैना को नहीं, बल्कि उसकी बगल वाली सीट को, जहाँ वो चुप लड़की बैठी थी। उस लड़की के चेहरे पर एक अजीब सा भाव था,। जैसे ही नैना की नज़र उससे मिली, उसने जल्दी से मुँह फेर लिया और खिड़की से बाहर देखने लगी।

नैना का गला थोड़ा सूखने लगा। उसने फिर एक बार अपनी बगल वाली लड़की की तरफ देखा। इस बार उसे लगा कि उस लड़की की नोटबुक के पन्ने हल्के से हिल रहे हैं — जैसे कोई हवा चल रही हो — पर बस की खिड़कियाँ बंद थीं, कोई हवा नहीं आ रही थी।

“आप ठीक हो?” नैना ने फिर पूछा, इस बार आवाज़ में हल्की घबराहट के साथ।

लड़की ने पहली बार सिर घुमाया। उसकी आँखें नैना की तरफ मुड़ीं — जैसे नज़रें नैना पर टिकी हों, पर देख उसके आर-पार कुछ और रही हों। होंठ हिले, बहुत धीरे, जैसे कुछ कहने की कोशिश कर रहे हों, पर आवाज़ नहीं निकली।

बस अचानक एक हल्के से झटके के साथ रुकी — हॉस्टल का स्टॉप आ गया था। नैना जल्दी से खड़ी हुई और दरवाज़े की तरफ भागी। नीचे उतरते हुए उसने पीछे मुड़कर देखा — वो सीट खाली थी। कोई नोटबुक नहीं, कोई लड़की नहीं। जैसे वहाँ कभी कोई बैठा ही न हो।

हॉस्टल पहुँचकर उसने ईशिता को पूरी बात बताई, उम्मीद थी कि वो हँस देगी और कहेगी “तुझे वहम हुआ होगा।“ पर ईशिता का चेहरा बात सुनते ही सफ़ेद पड़ गया।“

किस सीट पर बैठी थी वो? पीछे वाली, खिड़की के पास?” नैना ने हाँ में सिर हिलाया।

ईशिता कुछ देर चुप रही, फिर बोली, “तू बस अगली बार उस सीट पर मत बैठना। और… किसी और को मत बताना, वैसे भी कोई मानेगा नहीं।“

“क्यों, वो सीट किसी की रिजर्व है क्या?” नैना ने हल्के में लेने की कोशिश की।

ईशिता ने कोई जवाब नहीं दिया, बस अपनी किताब उठाई और पढ़ने का बहाना करने लगी। नैना समझ गई कि आज रात इस विषय पर और बात नहीं होगी।

अगली सुबह क्लास के लिए निकलते वक्त नैना उसी बस स्टॉप पर खड़ी थी, दिन वाली बस का इंतज़ार करते हुए। कंडक्टर, जिसे सब “भगत दा” कहकर बुलाते थे, उसे टिकट देते हुए अचानक रुक गया। उसने नैना को ऊपर से नीचे तक देखा, जैसे कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो।

“कल रात वाली बस में नहीं दिखी तुम,” उसने कहा, टिकट पकड़ाते हुए।

नैना को लगा शायद उसने ठीक से नहीं देखा होगा भीड़ में। “नहीं दिखी? मैं तो थी, नौ बजे वाली बस में, पीछे वाली सीट पर बैठी थी।“

भगत दा के हाथों की हरकत रुक गई। उसने नैना की तरफ इस तरह देखा जैसे उसने कुछ भूत देख लिया हो।

“बेटा,” उसने धीरे से कहा, आवाज़ में एक अजीब सी सावधानी थी, “कल रात की बस में कोई नई लड़की नहीं चढ़ी थी। मैं हर टिकट खुद काटता हूँ। कल रात… तुम उस बस में नहीं थी।“

“कहानी अभी शुरू हुई थी। असली सच सामने आयेगा भाग 2 में।”

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Part 2:- Girls Hostel Ki Darawani Kahani Part 2


Girls Hostels से जुड़े कुछ सवाल-जवाब ( FAQs )

हॉस्टल में रहने वाली लड़कियों के लिए बुनियादी सुरक्षा टिप्स क्या हैं?

हॉस्टल की टाइमिंग का पालन करें, अकेले देर रात बाहर निकलने से बचें, और रूममेट या वार्डन को अपने आने-जाने का समय ज़रूर बताएं।

क्या रात में अकेले बस या किसी अनजान रूट पर सफर करना सुरक्षित है?

अकेले रात में सफर करते वक्त हमेशा किसी दोस्त को अपनी लाइव लोकेशन शेयर करें, और मुमकिन हो तो ऐसी सीट चुनें जहाँ ड्राइवर और बाकी यात्री आपको आसानी से देख सकें।

अगर सफर के दौरान कुछ असामान्य महसूस हो तो क्या करना चाहिए?

घबराने की बजाय शांत रहें और जहाँ तक हो सके भीड़भाड़ वाली या रोशनी वाली जगह पर रुकें।


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