माँ ने मरने से पहले कहा था—खिड़की मत खोलना

रघु की माँ मरने से पहले उसे सिर्फ एक बात कहकर गई थी—“आधी रात के बाद अगर खिड़की पर कोई मेरा नाम लेकर बुलाए, तो खिड़की मत खोलना।”


कहानी की शुरुआत

रात के करीब बारह बज रहे थे। बाहर बहुत तेज बारिश हो रही थी। पुराने कच्चे घर की खपरैल पर गिरती बूंदों की लगातार आवाज पूरे घर में गूंज रही थी। कभी-कभी हवा का तेज झोंका आता तो खिड़की के पुराने लकड़ी के पल्ले कांप उठते और नीम की शाखाएं उनसे टकराकर अजीब-सी आवाज पैदा करतीं। कमरे के एक कोने में मिट्टी का दिया जल रहा था, जिसकी लौ हवा के हर झोंके के साथ कांपती और दीवार पर बैठे अंधेरे को कभी छोटा तो कभी बड़ा कर देती।

उसी कमरे में एक पुरानी चारपाई पर रघु की बूढ़ी माँ लेटी थी। उसकी सांस बहुत धीमी हो चुकी थी, चेहरा पीला पड़ गया था और आंखें आधी बंद थीं। रघु पिछले कई घंटों से अपनी माँ का हाथ पकड़े उसके पास बैठा था। उसकी उम्र करीब तीस साल थी और इस दुनिया में माँ के अलावा उसका अपना कहने वाला कोई नहीं था। पिता की मौत कई साल पहले हो चुकी थी और रघु ने शादी भी नहीं की थी। खेती-बाड़ी करके जैसे-तैसे दोनों का गुजारा चलता रहा।

पिछले कुछ महीनों से उसकी माँ लगातार बीमार थी। गांव के डॉक्टर ने शहर ले जाकर इलाज कराने की सलाह दी थी, लेकिन रघु के पास इतने पैसे नहीं थे। आज शाम से ही उसकी हालत अचानक बहुत बिगड़ गई थी और रघु को अंदर से महसूस हो रहा था कि शायद यह उनकी आखिरी रात है।

वह बार-बार माँ के चेहरे को देखता और फिर नजरें झुका लेता। उसे डर लग रहा था, लेकिन वह उस डर को भी स्वीकार नहीं करना चाहता था।

अचानक उसकी माँ ने उसकी उंगलियां कसकर पकड़ लीं। रघु चौंककर उसकी तरफ झुका। माँ ने बड़ी मुश्किल से आंखें खोलीं और कुछ पल तक बिना पलक झपकाए उसे देखती रही। “रघु…” उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि रघु को अपना कान उनके मुंह के पास ले जाना पड़ा। “हां, अम्मा,” उसने धीरे से जवाब दिया।

माँ ने कुछ पल सांस लेने के लिए आंखें बंद कीं, फिर बोली, “आज रात… मेरे मरने के बाद…” रघु का दिल बैठ गया। उसने तुरंत कहा, “ऐसा मत बोल अम्मा।” लेकिन माँ ने उसकी बात जैसे सुनी ही नहीं। उसने कमरे की पिछली दीवार पर बनी खिड़की की तरफ देखा। वह खिड़की बहुत पुरानी थी और उसके बाहर एक विशाल नीम का पेड़ खड़ा था। दिन में भी उस पेड़ की घनी शाखाओं के कारण घर के पीछे का हिस्सा हमेशा अंधेरा रहता था।

माँ ने रघु का हाथ और कसकर पकड़ लिया। “ध्यान से सुन। आधी रात के बाद अगर खिड़की पर कोई आए… तो खिड़की मत खोलना।” रघु ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। “कौन आएगा?” माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी नजर अब भी खिड़की पर टिकी थी। फिर उसने बहुत धीमी आवाज में कहा, “अगर कोई मेरा नाम लेकर बुलाए… फिर भी खिड़की मत खोलना।”

रघु के चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई देने लगी। “अम्मा, तुम कैसी बातें कर रही हो?” माँ ने उसकी तरफ देखा। उसकी आंखों में ऐसा डर था जिसे रघु ने पहले कभी नहीं देखा था। उसने कांपते होंठों से कहा, “चाहे आवाज मेरी ही क्यों न हो।” कमरे में अचानक ठंड बढ़ गई। बाहर बारिश पहले से ज्यादा तेज हो गई थी। रघु कुछ समझ नहीं पा रहा था कि उसकी माँ ऐसा क्यों कह रही है।

वह कुछ और पूछ पाता, उससे पहले माँ ने आंखें बंद कर लीं। उसकी सांसें धीरे-धीरे कमजोर होती गईं और कुछ ही देर बाद उसकी पकड़ रघु की उंगलियों से ढीली पड़ गई। रघु बहुत देर तक उसका हाथ पकड़े बैठा रहा। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसकी माँ चली गई है।

पहली रात

अगले दिन शाम तक अंतिम संस्कार की सारी रस्में पूरी हो गईं। दूर के रिश्तेदार और गांव वाले धीरे-धीरे अपने घर लौट गए। सूरज ढलने के बाद जब रघु अपने पुराने घर में वापस आया, तो पहली बार उसे वह घर इतना बड़ा और इतना खाली लगा।

माँ की चारपाई अभी भी उसी जगह पड़ी थी। उस पर उनकी पुरानी चादर थी और सिरहाने के पास दवाइयों की शीशियां रखी थीं। कमरे में अब भी उनकी दवाइयों और तेल की मिली-जुली गंध थी।

रघु ने खाना नहीं खाया। वह काफी देर तक माँ की चारपाई के पास बैठा रहा और फिर उसी कमरे की दूसरी चारपाई पर जाकर लेट गया। आंखें बंद करते ही उसे माँ का चेहरा दिखाई देने लगता और फिर उनकी आखिरी बात कानों में गूंजने लगती—“चाहे आवाज मेरी ही क्यों न हो।”

रात के करीब एक बजे अचानक खिड़की पर कुछ टकराया।

ठक।

रघु ने आंखें खोल दीं। कुछ सेकंड तक वह अंधेरे में खिड़की को देखता रहा। फिर खुद को समझाया कि शायद नीम की कोई शाखा हवा से खिड़की से टकराई होगी। उसने करवट बदली और आंखें बंद कर लीं। कुछ ही पल बाद फिर आवाज आई।

ठक… ठक…

इस बार आवाज पहले से साफ थी। रघु धीरे से उठकर बैठ गया। कमरे में सिर्फ मिट्टी के दीये की बहुत हल्की रोशनी थी और उसकी नजर खिड़की पर जम गई थी। तभी बाहर से किसी ने बहुत धीमी आवाज में पुकारा, “रघु…”

उसका पूरा शरीर सुन्न हो गया।

वह आवाज उसकी माँ की थी। बिल्कुल उसकी माँ की। वही धीमा स्वर, वही अपनापन और नाम पुकारने का वही तरीका, जैसा उसकी माँ बचपन से करती आई थी। रघु चारपाई से उतरकर खिड़की की तरफ बढ़ा। बाहर घना अंधेरा था। और बहुत तेज़ बारिश हो रही थी।

फिर आवाज आई, “रघु… बेटा…” रघु की आंखों में अचानक आंसू आ गए। उसके कदम अपने आप खिड़की की तरफ बढ़ने लगे। लेकिन तभी उसकी माँ की आखिरी बात उसके दिमाग में कौंध गई—“खिड़की मत खोलना।” वह वहीं रुक गया। बाहर से आवाज आई, “बेटा… खिड़की खोल दे। मैं बाहर हूं।”

रघु की सांस तेज हो गई। वह खिड़की से कुछ ही कदम दूर खड़ा था, लेकिन अब उसके पैर जैसे जमीन में गड़ गए थे। उसका मन कह रहा था कि यह उसकी माँ है। शायद वह किसी तरह वापस आई है। शायद वह उसे कुछ बताना चाहती है। लेकिन उसका दिमाग लगातार कह रहा था कि उसकी माँ मर चुकी है।

“रघु…” बाहर से फिर आवाज आई। रघु ने इस बार अपने कानों पर हाथ रख लिए। कुछ देर तक बाहर से कोई आवाज नहीं आई। फिर ऐसा लगा जैसे कोई खिड़की से दूर जा रहा हो। पैरों की बहुत हल्की आवाज सुनाई दी और फिर सब शांत हो गया। रघु पूरी रात नहीं सोया।

खिड़की के नीचे के निशान

सुबह होते ही रघु ने खिड़की खोली और बाहर देखा। बारिश के कारण मिट्टी पूरी तरह गीली थी। खिड़की के ठीक नीचे उसे पैरों के कुछ निशान दिखाई दिए। नंगे पैरों के निशान। रघु झुककर उन्हें देखने लगा। निशान खिड़की के बिल्कुल पास से शुरू होते थे और बाहर की तरफ जा रहे थे। करीब दस कदम आगे जाकर वे अचानक खत्म हो जा रहे थे।

अजीब बात यह थी कि निशान घर की तरफ से खिड़की तक नहीं आए थे। ऐसा लग रहा था जैसे कोई रात में खिड़की के बाहर खड़ा हुआ हो और फिर वहां से अंधेरे में चला गया हो। रघु काफी देर तक उन निशानों को देखता रहा। उसके शरीर में एक ठंडी लहर दौड़ गई। उसने मिट्टी पर नजरें जमाए हुए धीरे से खुद से कहा, “अम्मा…” लेकिन उसी क्षण उसे याद आया कि माँ ने उसे किसी भी आवाज का जवाब देने से मना किया था।

उस दिन उसने गांव में किसी से कुछ नहीं कहा।

दूसरी रात

अगली रात रघु ने सावधानी के लिए खिड़की के सामने एक भारी संदूक रख दिया। उसने दरवाजा अंदर से बंद किया और देर रात तक जागता रहा। करीब एक बजे तक सब शांत रहा। फिर अचानक खिड़की के दूसरी तरफ से कुछ रगड़ने की आवाज आने लगी।

खर्र… खर्र… खर्र…

ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपने नाखूनों से लकड़ी को धीरे-धीरे खुरच रहा हो। रघु का शरीर तनाव से अकड़ गया। वह चुपचाप बैठा खिड़की को देखता रहा। कुछ देर बाद आवाज बंद हो गई। फिर बाहर से किसी के रोने की आवाज आने लगी। बहुत धीमी, जैसे कोई औरत अपना मुंह दबाकर रो रही हो।

रघु की आंखों में डर उतर आया। “रघु…” वही आवाज फिर सुनाई दी। “बेटा…” रघु ने अपने कान बंद कर लिए। लेकिन आवाज और साफ होती गई। “दरवाजा मत खोलना… खिड़की खोल दे।”

आवाज में वही अपनापन था। फिर वह रोते हुए बोली, “बहुत ठंड लग रही है बेटा। मुझे अंदर आने दे।” रघु की आंखों से आंसू निकल आए। उसकी माँ भी बारिश की रातों में अक्सर यही कहा करती थी, “बेटा, खिड़की बंद कर दे, ठंडी हवा आ रही है।” लेकिन रघु जानता था कि यह उसकी माँ नहीं हो सकती। वह चुप रहा।

कुछ देर बाद रोने की आवाज बंद हो गई। फिर खिड़की पर अचानक जोरदार चोट पड़ी।

धड़ाम!

रघु उछल पड़ा। दूसरी चोट पहले से ज्यादा तेज थी।

धड़ाम!

फिर तीसरी।

धड़ाम!

खिड़की के पल्ले कांपने लगे। बाहर से अब रोने की आवाज नहीं आ रही थी। उसकी जगह एक गुस्से से भरी आवाज थी।

“तू मुझे अंदर क्यों नहीं आने दे रहा?”

रघु चुप रहा।

“रघु!”

खिड़की फिर जोर से हिली।

“खोल!”

रघु ने आंखें बंद कर लीं।

“खोल!”

आवाज इतनी तेज थी कि रघु को लगा जैसे पूरा घर कांप रहा है। फिर अचानक सब कुछ शांत हो गया। कुछ पल बाद वही आवाज बहुत धीमी होकर बोली, “ठीक है…”

रघु ने आंखें खोलीं।

बाहर से आवाज आई, “आज तू नहीं खोलेगा…” कुछ सेकंड की खामोशी के बाद आवाज और धीमी हो गई—“तो कल खोलना पड़ेगा।”

उसके बाद पूरी रात कोई आवाज नहीं आई।

हरिया काका का डर

अगली सुबह रघु सीधे गांव के सबसे बुजुर्ग आदमी हरिया काका के घर गया। काका ने उसे देखते ही पूछा, “क्या हुआ?” रघु ने रात की पूरी बात उन्हें बता दी। हरिया काका काफी देर तक चुप बैठे रहे। फिर उन्होंने पूछा, “तेरी अम्मा ने मरने से पहले तुझे कुछ और बताया था?”

“बस इतना कि रात में कोई खिड़की पर आए तो खिड़की न खोलूं।”

काका का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

“और कुछ?”

रघु ने सिर हिलाया। “नहीं।”

हरिया काका ने कुछ देर तक उसे देखा और फिर बोले, “तेरी अम्मा ने कभी तुझे अपने बचपन के बारे में बताया था?” रघु ने कहा, “बहुत कम।”

काका ने गहरी सांस ली। “जब तेरी अम्मा जवान थी, तब इस गांव में एक लड़की रहती थी। उसका नाम जमुना था।”

रघु ने पूछा, “कौन थी वो?”

काका ने कहा, “तेरी अम्मा की छोटी बहन।”

रघु कुछ पल तक चुप रहा। उसे इस बारे में कभी कुछ नहीं बताया गया था।

काका आगे बोले, “जमुना एक रात अचानक गायब हो गई थी। गांव में कहा गया कि वह कुएं में गिर गई होगी, लेकिन उसका शरीर कभी नहीं मिला।”

रघु ने बेचैनी से पूछा, “इसका मेरी अम्मा से क्या संबंध है?”

काका ने सीधा जवाब नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ इतना कहा, “तेरी अम्मा से पूछना था।”

रघु की आंखें झुक गईं। “अब तो वो…”

काका ने उसकी बात बीच में रोक दी। “मरने से पहले उसने तुझे खिड़की के बारे में बताया था?”

“हां।”

हरिया काका ने आंखें बंद कर लीं। कुछ देर बाद बहुत धीमी आवाज में बोले, “तो उसने बहुत देर कर दी।”

माँ की पुरानी संदूकची

उस रात रघु ने घर में पड़े माँ के पुराने सामान को देखना शुरू किया। उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था—आखिर उसकी माँ खिड़की से इतना क्यों डरती थी? उसे घर के एक कोने में माँ की पुरानी लोहे की संदूकची दिखाई दी। उसने कई सालों से उसे नहीं खोला था।

ताला खोलकर उसने अंदर रखे कपड़ों को एक-एक करके बाहर निकाला। नीचे कुछ पुरानी तस्वीरें थीं, उसकी माँ की शादी की तस्वीर और कुछ ऐसे कागज जिन पर समय की नमी के निशान पड़े हुए थे। सबसे नीचे एक छोटी-सी कपड़े की पोटली मिली।

उसमें चांदी की एक पुरानी पायल थी। रघु उस पायल को पहचानता था। बचपन में उसने यही पायल माँ के पास देखी थी, लेकिन उसने कभी नहीं पूछा था कि वह किसकी है।

पायल के नीचे एक मुड़ा हुआ कागज था। रघु ने उसे खोला। उस पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था—

“जिसे मैंने खिड़की के बाहर छोड़ा था, वह अब मेरे बेटे को बुलाएगा।”

रघु के हाथ से कागज छूट गया।

उसी समय खिड़की पर हल्की दस्तक हुई।

टक।

रघु जम गया।

फिर दूसरी दस्तक हुई।

टक।

इस बार बाहर से आवाज आई, “रघु…”

वही आवाज।

उसकी माँ की आवाज।

रघु धीरे-धीरे पीछे हट गया। बाहर से आवाज आई, “तूने मेरी चीज ढूंढ ली?”

रघु ने कोई जवाब नहीं दिया।

कुछ देर बाद बाहर से हल्की हंसी सुनाई दी। “तुझे सच जानना है?”

रघु खामोश रहा।

आवाज फिर आई, “तो खिड़की खोल।”

रघु ने इस बार कांपते हुए कहा, “नहीं।”

बाहर कुछ पल शांति रही। फिर आवाज आई, “ठीक है। आज तू नहीं खोलेगा…”

कुछ पल की खामोशी के बाद आवाज बहुत धीमी हो गई।

“लेकिन तेरी माँ ने तो खोली थी।”

रघु का चेहरा सफेद पड़ गया। बाहर तेज हवा चली। नीम की शाखाएं खिड़की से टकराने लगीं और उसी शोर के बीच उसे ऐसा लगा जैसे कोई उसके बिल्कुल कान के पास आकर फुसफुसाया हो—

“वह रात याद कर…”

माँ का छिपाया हुआ सच

बचपन में रघु अक्सर अपनी माँ से घर के पीछे वाले नीम के पेड़ के बारे में पूछा करता था। एक बार उसने पूछा था, “अम्मा, यह पेड़ कितना पुराना है?” माँ ने सिर्फ इतना कहा था, “बहुत पुराना है।”

रघु ने फिर पूछा था, “क्या पहले यहां कोई और घर था?” उस दिन माँ काफी देर तक चुप रही थी। फिर उसने कहा था, “हां।”

“किसका?”

माँ ने उसकी तरफ देखा और चुपचाप चली गई थी।

तब रघु ने उस बात को ज्यादा महत्व नहीं दिया था। लेकिन अब उसे सब कुछ याद आने लगा था।

अगली सुबह वह फावड़ा लेकर नीम के पेड़ के पास पहुंचा। बारिश के कारण मिट्टी नरम थी। वह काफी देर तक खोदता रहा। अचानक फावड़ा किसी कठोर चीज से टकराया।

ठक।

रघु का हाथ रुक गया।

उसने मिट्टी हटाई तो नीचे एक पुराना लोहे का डिब्बा दिखाई दिया। डिब्बा जंग से लगभग गल चुका था। रघु ने उसे बाहर निकाला और खोला।

अंदर कुछ पुराने कागज, कपड़े में लिपटी तस्वीरें और एक चिट्ठी थी।

चिट्ठी उसकी माँ की लिखावट में थी।

रघु ने कांपते हाथों से उसे खोलकर पढ़ना शुरू किया।

“रघु, अगर तू यह पढ़ रहा है तो तब तक मैं जा चुकी हूं। मैंने तुझसे बहुत सालों तक एक बात छिपाई। इस घर में हम कभी अकेले नहीं रहते थे।”

रघु का दिल तेजी से धड़कने लगा।

चिट्ठी में आगे लिखा था—

“बहुत साल पहले मैं और मेरी छोटी बहन जमुना इसी जगह रहते थे। एक रात जमुना गायब हो गई। गांव वालों ने कहा कि वह भाग गई।”

रघु आगे पढ़ता गया।

“उस रात मैंने उसे खिड़की के बाहर देखा था। वह रो रही थी और मुझे अंदर बुलाने के लिए कह रही थी। मैंने खिड़की खोल दी।”

इसके आगे कुछ शब्द पानी के कारण मिट चुके थे। फिर नीचे एक लाइन साफ दिखाई दे रही थी—

“लेकिन बाहर जमुना नहीं थी।”

रघु की उंगलियां कांपने लगीं।

उसने अगली लाइन पढ़ी—

“वह कुछ और था।” एक ऐसी अलौकिक चीज़ थी जो इंसानों की आवाज़ की नकल कर सकती थी।

तीसरी रात

उस रात रघु ने घर छोड़कर कहीं जाने का फैसला नहीं किया। उसे लग रहा था कि अगर वह भागा तो शायद वह चीज उसके पीछे से उसके घर पे कब्जा कर लेगी। उसने सभी खिड़कियां बंद कीं, दरवाजे पर अंदर से कुंडी लगाई और माँ की चिट्ठी अपने सामने रखकर बैठ गया।

घड़ी में बारह बजकर सात मिनट हुए।

अचानक घर के बाहर किसी के चलने की आवाज आई।

छपाक…

फिर दूसरा कदम।

छपाक…

फिर तीसरा।

आवाज धीरे-धीरे खिड़की की तरफ बढ़ती गई।

रघु ने सांस रोक ली।

फिर—

टक।

खिड़की पर किसी उंगली ने दस्तक दी।

फिर दो बार और।

टक… टक…

बाहर से आवाज आई, “रघु…”

वही आवाज।

उसकी माँ की।

लेकिन इस बार रघु डरने के बजाय गुस्से में आ गया। वह खिड़की के पास गया, लेकिन पल्ला नहीं खोला।

उसने पूछा, “तू कौन है?”

कुछ देर कोई जवाब नहीं आया।

फिर आवाज आई, “मैं तेरी माँ हूं।”

रघु ने कहा, “मेरी माँ मर चुकी है।”

बाहर से हल्की हंसी सुनाई दी।

“नहीं बेटा… मैं बाहर हूं।”

रघु ने पूछा, “अगर तू मेरी माँ है तो बता, मेरी माँ ने मुझे आखिरी बार क्या कहा था?”

बाहर अचानक सन्नाटा छा गया।

रघु खिड़की को देखता रहा।

कुछ सेकंड बाद आवाज आई—

“खिड़की खोल।”

रघु के चेहरे पर डर की जगह अब यकीन था।

“तुझे नहीं पता।”

बाहर से कोई जवाब नहीं आया।

अचानक खिड़की पर जोरदार चोट पड़ी।

धड़ाम!

फिर दूसरी।

धड़ाम!

तीसरी चोट के साथ लकड़ी का एक हिस्सा टूट गया।

रघु पीछे हट गया।

बाहर से वही आवाज चीखी—

“खिड़की खोल!”

रघु ने आंखें बंद कर लीं।

तभी घर के अंदर से किसी ने बहुत धीमी आवाज में कहा—

“मत खोलना।”

रघु ने झटके से आंखें खोल दीं।

आवाज उसके पीछे से आई थी।

उसने धीरे-धीरे गर्दन घुमाई।

कमरे के अंधेरे कोने में उसकी माँ की पुरानी चारपाई पड़ी थी।

और उस चारपाई पर…

कोई बैठा था।

सफेद साड़ी में।

सिर झुकाए हुए।

रघु की सांस जैसे वहीं रुक गई।

उसने कांपते हुए कहा, “अम्मा?”

वह आकृति धीरे-धीरे सिर उठाने लगी। चेहरा अभी भी अंधेरे में था। फिर आवाज आई—

“मैंने कहा था ना…”

कुछ पल की खामोशी के बाद वह बोली—

“खिड़की मत खोलना।”

रघु की आंखों में आंसू आ गए।

उसी समय बाहर से एक भयानक चीख सुनाई दी—

“झूठ बोल रही है!”

रघु का पूरा शरीर कांप उठा।

बाहर वाली आवाज चीख रही थी, “मैं तेरी माँ हूं!”

चारपाई पर बैठी आकृति ने धीरे-धीरे सिर उठाया। अब उसका चेहरा साफ दिखाई दे रहा था।

वह रघु की माँ थी।

लेकिन उसके चेहरे पर वह डर नहीं था जो कुछ दिन पहले मौत से पहले दिखाई दे रहा था। चेहरे पर अजीब-सी शांति थी।

उसने कहा, “बेटा…”

रघु रोते हुए उसकी तरफ बढ़ा।

माँ ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

“मेरे पास मत आ।”

रघु रुक गया।

माँ ने खिड़की की तरफ देखा और बोली, “वह मुझे अंदर आने के लिए नहीं कह रही।”

रघु ने धीरे से पूछा, “तो फिर?”

माँ ने कहा, “वह तुझे बाहर बुला रही है।”

रघु ने खिड़की की तरफ देखा।

बाहर अब कोई आवाज नहीं थी।

पूरे घर में ऐसा सन्नाटा था जैसे बाहर कोई था ही नहीं।

कुछ देर बाद खिड़की के दूसरी तरफ से बहुत धीमी आवाज आई—

“रघु…”

इस बार वह आवाज उसकी माँ की नहीं थी।

वह उसकी अपनी आवाज थी।

बिल्कुल उसी तरह जैसे रघु खुद बोलता था।

“रघु…”

फिर बाहर से आवाज आई—

“दरवाजा खोल।”

रघु की आंखें फैल गईं।

चारपाई पर बैठी उसकी माँ ने सिर झुका लिया।

“अब इसे पता चल गया है कि तू डर रहा है।”

रघु ने कांपते हुए पूछा, “अब क्या होगा?”

माँ ने उसकी तरफ देखा।

“सुबह होने तक किसी भी हालत में खिड़की मत खोलना।”

“और अगर उसने दरवाजा खटखटाया?”

माँ कुछ पल चुप रही।

रघु ने फिर पूछा, “अगर दरवाजा खटखटाया तो?”

माँ ने बहुत धीरे से कहा, “दरवाजा भी मत खोलना।”

“और अगर वह मेरा नाम लेकर बुलाए?”

“जवाब मत देना।”

“अगर आपकी आवाज में बोले?”

माँ ने उसकी आंखों में देखा।

“फिर भी नहीं।”

रघु ने घबराकर पूछा, “क्यों?”

माँ की आंखों से आंसू निकल आए।

“क्योंकि…” वह कुछ पल रुकी, “वह अब सिर्फ मेरी आवाज नहीं निकाल सकती।”

उसी क्षण घर के बाहर किसी बच्चे के रोने की आवाज आई। फिर किसी बूढ़े आदमी की। फिर किसी औरत की। फिर रघु की अपनी आवाज। एक के बाद एक आवाजें आने लगीं। ऐसा लग रहा था जैसे घर के चारों तरफ बहुत सारे लोग खड़े होकर उसे बुला रहे हों।

कोई उसे प्यार से पुकारता, कोई रोता, कोई गुस्से में चिल्लाता और कोई उसकी माँ की आवाज में कहता, “बेटा, मुझे अंदर आने दे।” लेकिन रघु चुप बैठा रहा। उसने किसी आवाज का जवाब नहीं दिया। रात बहुत लंबी थी। घड़ी की हर टिक-टिक उसे पहले से ज्यादा तेज सुनाई दे रही थी।

फिर धीरे-धीरे बाहर का अंधेरा हल्का होने लगा। मुर्गे की पहली आवाज सुनाई दी और उसी क्षण सभी आवाजें बंद हो गईं। एकदम।

रघु ने राहत की सांस ली। उसने खिड़की की तरफ देखा। वह अब भी बंद थी। फिर उसने चारपाई की तरफ देखा।

उसकी माँ वहां नहीं थी।

सिर्फ उनकी पुरानी चादर पड़ी थी।

खिड़की खोल दी

रघु कुछ देर तक चारपाई को देखता रहा। फिर वह धीरे-धीरे कमरे से बाहर आया।

उसे लगा सुबह हो गई है, और उसने खिड़की खोल दी। खिड़की के नीचे मिट्टी में फिर वही नंगे पैरों के निशान थे।

रघु की नजरें उन निशानों पर जम गईं। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। वह धीरे-धीरे वापस कमरे की तरफ मुड़ा।

तभी उसकी नजर खिड़की के शीशे पर पड़ी।

शीशे पर अंदर की तरफ किसी ने उंगली से कुछ लिखा था।

चार शब्द।

“अब मैं अंदर हूं।”

रघु के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई।

उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर कमरे के अंदर देखा।

माँ की चारपाई पर कोई बैठा था।

सफेद साड़ी में।

सिर झुकाए हुए।

बिल्कुल उसकी माँ की तरह।

रघु दरवाजे पर खड़ा रहा। उसके शरीर में इतनी ताकत नहीं थी कि वह एक कदम भी आगे बढ़ा सके।

चारपाई पर बैठी आकृति ने धीरे-धीरे सिर उठाया।

चेहरा उसकी माँ का था।

वही आंखें।

वही सफेद बाल।

वही साड़ी।

लेकिन चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी, जिसे देखकर रघु के शरीर में सिहरन दौड़ गई।

उसने बहुत धीमी आवाज में कहा—

“रघु…”

रघु पीछे हट गया।

आकृति ने मुस्कुराते हुए कहा—

“अब तो खिड़की खोल दे बेटा।”

बाहर अचानक तेज हवा चली और खिड़की के पल्ले जोर-जोर से कांपने लगे। रघु ने आखिरी बार खिड़की की तरफ देखा।

रघु ने पीछे मुड़कर देखा तो वह आकृति उसके बिल्कुल पास खड़ी थी। उसने धीरे से रघु के कान के पास झुककर फुसफुसाया, “अब समझ आया… तेरी माँ खिड़की से क्यों डरती थी?”

सुबह जब सूरज निकला, तो गांव वालों ने उस दिन रघु को बहुत खोजा, लेकिन उसका कुछ पता नहीं चला। कुछ लोगों ने कहा कि वह डरकर कहीं चला गया होगा। कुछ ने कहा कि शायद रात में घर छोड़कर भाग गया।

लेकिन हरिया काका जानते थे कि सच क्या था। फिर भी चुप रहे।

—समाप्त—

अगर आपको रघु की यह कहानी डरावनी लगी, तो सोचिए… अगर आधी रात को आपकी खिड़की पर कोई आपकी माँ की आवाज़ में आपका नाम लेकर पुकारे, तो क्या आप खिड़की खोलेंगे?

ऐसी ही रहस्यमयी और डरावनी हिंदी हॉरर कहानियों के लिए हमारी अगली कहानी जरूर पढ़ें। लेकिन एक बात याद रखिए—हर आवाज़ पर भरोसा मत करना… क्योंकि कभी-कभी जो बाहर से आपको बुला रहा होता है, वह…


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